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एक सिसकती नदी की कहानी

Root News of India 2020-06-01 17:15:29    EDITORSPICK 17531
एक सिसकती नदी की कहानी
गंगा दशहरा के बहाने सोमवार है। बम भोले की पूजा का दिन है। संयोग से गंगा दशहरा भी है। धर्म-ज्ञान के जानकार कहते हैं कि शिवजी की जटा से ही तो निकली है हर-हर गंगे, लेकिन मैं चर्चा करूंगा दामोदर नदी की। आज आपको सुनाऊंगा एक सिसकती नदी की कहानी। जिस तरह सांप के लिए उसका बहुमूल्य मणि अभिशाप बन जाती है, उसी तरह धरा की कोख पर अकूत खनिज़ सम्पदा ने दामोदर को तबाह कर दिया है।क्या नहीं है इसके तट पर? कोयला, लोहा, तांबा, मैगनीज़, बालू....सबकुछ। बड़े भू-भाग को यह नदी सिंचित भी करती है।अब तो विदेशियों की नज़र पड़ गई है दामोदर पर। दर्द और ज़ख्म से कराह रही सबसे अधिक मिनरल्स संभालकर रखी एक असहाय, उपेक्षित नदी। सहम सी गई है दामोदर, जिसके रौद्ररूप से कभी दुनिया सहमती थी।

दामोदर 'नदी' नहीं है। यह नद है।पौरुषता इसकी पहचान है। इसे 'देवनद' भी कहा जाता है। जानकार कहते हैं कि भगीरथ पवित्र गंगा का आवाहन धरा पर करने के पहले इसी देवनद का चरण स्पर्श करने आए थे।

कहा तो यहां तक जाता है कि सनातन, बौद्ध, जैन के साक्ष्यों को नदी तट के इलाके आज भी संभालकर रखे हैं। जल,जंगल, ज़मीन के लिए संघर्षरत वन-बंधुओं के विरोध के स्वर को आदिकाल से सींचती रही है यह नदी। पत्थरों में गुफाएं बनाकर चट्टानों को चीरती हुई यह नदी पलामू से होकर बंगाल की हुगली नदी तक लम्बा सफ़र तय करती है। मानभूम (बंगाल के पुरूलिया, झारखण्ड के धनबाद, बोकारो को मिलाकर एक बड़ा जिला पहले था) में ही आदि जैनियों का निवास रहा है। पुरूलिया के बलरामपुर से लेकर धनबाद के कतरास तक जैनियों की एक लम्बी श्रृंखला थी। दामोदर के तट पर रह रहे अहिंसा की राह पर चलनेवाले इस समुदाय को सराक कहा जाता है। संस्कृत के श्रावक अर्थात 'आस्था रखनेवालों' से संभवत: सराक शब्द की उत्पत्ति हुई है, ऐसा अनुमान लगाया जाता है। पुरूलिया जिले का तेलकुप्पी इस समुदाय का मुख्य केंद्र रहा है।इस समाज के लोग शुरू से ही मास्क लगाते हैं। मांसाहार से दूर रहते हैं।रात को भोजन के साथ कीड़े मकोड़े की भी हत्या न हो जाए इसलिए सूर्यास्त के बाद वे भोजन भी नहीं करते हैं। अपनों के बीच दूरी बनाकर रखते हैं और समय-समय एकांतवास में रहते हैं। उस समय पढ़ते हैं। ज्ञान अर्जित करते हैं। तीर्थंकर का ध्यान करते हैं। मेटालिस्टिक वर्ल्ड से कुछ समय तक खुद को अलग कर लेते हैं। आज जो मास्क, सोशल डिस्टेंस, क्वारेण्टाइन, आइसोलेशन का हौवा पूरी दुनिया में दिख रहा है और लोग आतंकित भी हैं, कभी दामोदर के तट पर हमारे ही किसी समुदाय के लिए यह परम आनन्द प्राप्ति का उत्सव था।

यही दामोदर आज तबाह है। तड़प रही है झारखण्ड-बंगाल की लाइफलाइन। झारखण्ड के लोहरदगा जिले के कुडू प्रखण्ड स्थित सलगी के दुर्गम जंगल के चूल्हापानी से 610 मीटर पहाड़ियों की ऊंचाई से यह नदी निकल रही है। गंगा दशहरा के अवसर पर उद्गम स्थल पर आज पूजा भी हो रही है। तकरीबन 600 किलोमीटर के आसपास की दूरी तय करती है यह नदी। झारखण्ड में 290 किलोमीटर का सफ़र करने के बाद पड़ोसी राज्य बंगाल में भी यह नदी 240 किलोमीटर की दूरी तय करती है। फ़िर हुगली नदी में विलीन हो जाती है। बंगाल के आसनसोल, रानीगंज, बांकुड़ा की सीमारेखा भी यह नदी तय करती है।

सन 1730 में दामोदर के रौद्ररूप से पूरी दुनिया थर्रा उठी थी। फ़िर तो इस नदी का कहर लगातार जारी रहा। वर्ष 1943 में दामोदर के बाढ़ ने बंगाल को तबाह कर दिया।उस समय इस नदी को 'बंगाल का शोक' कहा जाता था। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरूजी ने इस पर दुनिया के एक्सपर्टों से मदद मांगी। बंगाल के गवर्नर ने वर्दमान के महाराजा की अध्यक्षता में दामोदर को लेकर एक कमिटी बनाई जिसमें मशहूर वैज्ञानिक डॉ मेघनाद साहा को भी सदस्य बनाया गया था। डब्ल्यू एल बुड़ुइन ने इस पर एक रिपोर्ट सौंपी। अमेरिका के टेनेसी नदी घाटी पर बने प्रोजेक्ट के अनुरूप हमारे देश में भी दामोदर वैली कॉर्पोरेशन बना। बांध बना। जलविद्युत का उत्पादन शुरू हुआ। अमेरिका की 'टेनेसी वैली ऑथोरिटी (टीवीए) की तर्ज़ पर ही हमारे यहां दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) बना।

देश की सभ्यता, संस्कृति, प्रचूर खनिज़ सम्पदा को संभालकर रखी यह नदी आज उपेक्षित है।हर पल सरकार की, उद्यमियों की अंततः हमारी भी ज्यादती बर्दाश्त करती रहती है। उद्गमस्थल से कल कल बहकर उत्सव का गायन गाती पत्थरों का सीना चीरकर यह नदी निकलती है, लेकिन औद्योगिक शहरों में घुसते ही यह नदी कराह उठती है। अनगिनत कोलियरियां, वाशरी,ताप बिजली घर, छोटे-मोटे उद्योग सभी नदी की धारा में ज़हर घोलने की प्रतिस्पर्द्धा में लगे हैं। दामोदर के तट पर कुल दस थर्मल पावर प्लांट हैं, जहां से रोज 24 लाख मीट्रिक टन ज़हरीला कचड़ा दामोदर में जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 94 यूनिटों की पहचान की थी, जहां से 65 करोड़ टन गंधक पानी में मिलकर तेज़ाब बनाता था। एकसमय ऐसा आया था जब जानवर भी दामोदर के पानी पर मुंह नहीं लगाते थे। इसके साथ ही दामोदर बेसिन आज भयावह संकट में है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफ़िया गैरकानूनी तरीके से बालू की लूट मचाकर रखे हैं।

दामोदर आज है तो महानगर जगमग है। हम, आप रौशन है। यह इलाका 8,768 मेगावाट बिजली देश को देता है। फ़िर भी दामोदर का गला घोंटने की होड़ मची हुई है।

देश में अन्य नदियों की तरह दामोदर पर ध्यान किसी भी सरकार का नहीं होता है। केंद्र सरकार ने महानदी रिवर बेसिन प्रोग्राम बनाया था। इसमें दामोदर का आच्छादन मात्र 0.18 प्रतिशत है। यह ऊंट के मुंह में ज़ीरा के समान है। इसी तरह एनजीटी (नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) को भी कभी दामोदर के मामले में अपेक्षित गंभीर नहीं देखा गया।कम से कम दामोदर को बचाने के लिए सरकार को कैम्पा फण्ड का सहारा लेना चाहिए, जहां तकरीबन पांच हज़ार करोड़ का कोष मौज़ूद है।

दामोदर को लेकर पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक सरयू राय हल्ला करते रहे हैं। उनका अभियान निरंतर जारी रहा। बाकी जनप्रतिनिधि हमारी जीवन-धारा को लेकर रहस्यमय चुप्पी साधे रहे। कुछ तो दामोदर की धारा में डुबकी लगाकर अब तक अकूत सम्पत्ति का मालिक भी बन चुके हैं। सरकार का दावा है कि इधर दामोदर पहले की तरह प्रदूषित नहीं है।

इधर नए सिरे से दामोदर पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इस बार दुनिया के चर्चित खनन-दैत्यों के निशाने पर है दामोदर। भारत में कोयले पर शत-प्रतिशत एफडीआई लागू हो चुका है।अमरीकी और चीनी कम्पनियों की नज़र है हमारे कोयले पर।उनके लिए दरवाज़ा खुल गया है। भारत में करीब 319 बिलियन टन कोयले का भंडार है। इसमें 173 बिलियन टन में तुरन्त खनन सम्भव है। दुनिया में सबसे अधिक कोल रिज़र्व अमरीका के पास है। हमारा भंडार तो मात्र सात प्रतिशत है। हम भंडार के मामले में पांचवें स्थान पर हैं। जिन मुल्कों में कोयला अधिक है वे अगली पीढ़ी के लिए कोयला छोड़ दे रहे हैं। वे क्लीन एनर्जी के रास्ते पर चल पड़े हैं। ऐसे में वहां बेरोजगार हुई माइनिंग कम्पनियों के लिए हमारी माटी सबसे बेहतर साबित होती दिख रही है।सबसे कम भंडार होने के बावज़ूद हिंदुस्तान में कोयले का इस्तेमाल दुनिया में सबसे अधिक है। इसी से हमारा जीवन स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। फ़िर भी कोयले के लिए इतनी आपाधापी हैरत में डालनेवाली है।

दामोदर का दुर्भाग्य कहिये कि देश में सबसे अधिक कोयला तक़रीबन 80,716 मिलियन टन झारखण्ड में है। दामोदर के तट पर... धरा की कोख पर सुरक्षित यही कोयला दामोदर के लिए अभिशाप बननेवाला है।

एक नदी आज सिसक रही है। नेता मदमस्त हैं। उद्यमी खुद के दर्द से परेशान। मीडिया बेख़बर है। सर्वत्र दामोदर के प्रवाह को रोकने की कोशिशें जारी हैं। एक नदी की मौत...पूरी सभ्यता की मौत...संस्कृति का अंत। नमामि गंगे की तर्ज़ पर शायद दामोदर के लिए भी कोई रास्ता निकले। आनेवाली पीढ़ी के साथ यह बड़ा धोखा होगा। अमेरिका की टेनेसी के साथ दामोदर की तुलना होती है, लेकिन यहां रखवाले ही फंदा लेकर खड़े हैं। राजनीति से ऊपर उठकर दामोदर के दर्द को महसूसने की ज़रूरत है। इस देवनद का संरक्षण कर झारखण्ड से बंगाल तक एक इंडस्ट्रियल कॉरिडोर तो बनाया ही जा सकता है। एक नदी के बहाने कुबेर के ख़ज़ाने की लूट की तैयारी की यह अनकही कहानी है।

- उत्तम मुखर्जी







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पटना, 31 मई 2020, (आरएनआई)। बिहार मे सैकड़ों पत्रकारों की नौकरियां छीनने की हो रही है तैयारी, शुक्रवार को पटना से प्रकाशित हिंदुस्तान स्मार्ट का प्रकाशन बंद हो गया इससे पहले पटना से ही प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार के सभी कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर अखबार के एडिशन को बंद कर दिया गया हाल ही में हिंदुस्तान टाइम्स पटना संस्करण से भी पत्रकारों की छंटनी हुई. पटना संस्करण को ब्यूरो तक ही सीमित कर दिया गया. दैनिक भास्कर पटना संस्करण में भी छटनी कार्यक्रम प्रारंभ हो चुका है। बिहार के पत्रकारों के लिए सीखने की सबसे सटीक जगह माने जाने वाले प्रभात खबर ने भी कोरोना संकट के बहाने पत्रकारों के सैलरी में कटौती प्रारंभ कर दी है. दैनिक जागरण पटना संस्करण में भी एक साथ बड़े फेरबदल की तैयारी चल रही है. कमोबेश यही स्थिति पटना से प्रकाशित सभी अखबारों में है. राष्ट्रीय सहारा और आज दैनिक जैसे अखबार पहले ही से गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहे है इसका खामियाजा बिहार संस्करण में काम करने वाले पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है. कई सारे राष्ट्रीय अखबारों ने पटना से अपने ब्यूरो कार्यालय तक हटा लिया है, कोरोना काल खासकर पटना के अखबारों के लिए और उसमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए काला अध्याय साबित हो रहा है अखबार प्रबंधन वित्तीय स्थिति का हवाला देकर थोक के भाव में पत्रकारों को हटाने की तैयारी में है कुछ जगहों पर इसे लागू भी कर दिया गया है. वैसे भी बिहार में पत्रकारों की सैलरी अन्य प्रदेशों की अपेक्षा काफी कम है अखबार प्रबंधन के द्वारा मिलने वाली सुविधाएं भी नगण्य है.अखबार प्रबंधन ने अपने यहां कार्यरत पत्रकारों के अधिकारों का पहले ही से हनन कर रखा है अगर प्रबंधन उन्हें हटाता है तो एक चाह कर भी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते. आज दिनभर बिहार के कई सारे वरिष्ठ पत्रकारों ने फोन करके जानना चाहा कि किस अखबार से किसकी छुट्टी हो रही है. इसी बीच एक बड़ी खबर एक राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल के पटना ब्यूरो कार्यालय को भी लेकर आ रही है जहां व्यापक पैमाने पर फेरबदल की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सबके लिए न्याय की आवाज उठाने वाले पत्रकार बिरादरी के लिए आवाज उठाना तो दुर अखबार और चैनल प्रबंधन के खिलाफ डर के मारे कोई एक लाइन सोशल मीडिया पर भी लिखने को तैयार नहीं. आने वाले सप्ताह में बिहार में थोक के भाव में पत्रकारों की नौकरी छीनने की तैयारी हो रही है.
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दुनिया में संतुष्टि का अभाव पीड़ादायक
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पटना, 25 मई 2020, (आरएनआई)। सृष्टि में अमीर कौन है भिखारी कौन है इसको समझना पूरे ब्रम्हाण्ड को समझने जैसा है।आज के वक़्त में ना कोई राष्ट्र , ना कोई नेतृत्व ,ना कोई विश्वव्यापी व्यापारी, ना छोटा व्यापारी, ना समाज, ना परिवार और ना ही इंसान संतुष्ट है।सब को कुछ न कुछ और पाने की चाहत पीड़ा का कारण होता है।जिसको भगवान की दी हुई आशीर्वाद रूप में जीवन से जुड़ी सारी ज़रूरत से संतुष्टि नही है वह इंसान इस दुनिया में किसी सांसारी वस्तु से संतुष्ट नही हो सकता।किसी ने सही ही कहा है कि इस दुनिया में कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता है।इस संसार में जो भी इन्सान जन्म लेता है वो अपने साथ कुछ भी नहीं लाता है और जब इस संसार को छोड़कर जाता है तभी वो अपने साथ कुछ भी नहीं लेकर जाता है।परन्तु इंश्वर ने इस तरह का खेल इंसान के जीवन के साथ रचा की जब तक वो जिन्दा रहेगा पूरे जीवन भर भागता ही रहेगा।जिसके कारण वो अपनी पूरी जिंदगी इस संसार में कभी भी संतुष्ट नहीं होता है।इस बात को समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी का उदहारण देता हु।किसी दूर राज्य में एक राजा शासन करता था। राजा बड़ा ही परोपकारी स्वभाव का था, प्रजा का तो भला चाहता ही था। इसके साथ ही पड़ोसी राज्यों से भी उसके बड़े अच्छे सम्बन्ध थे। राजा किसी भी इंसान को दुःखी देखता तो उसका ह्रदय द्रवित हो जाता और वो अपनी पूरी श्रद्धा से जनता का भला करने की सोचता।एक दिन राजा का जन्मदिन था। उस दिन राजा सुबह सवेरे उठा तो बड़ा खुश था। राजा अपने सैनिकों के साथ वन में कुछ दूर घूमने निकल पड़ा। आज राजा ने खुद से वादा किया कि मैं आज किसी एक व्यक्ति को खुश और संतुष्ट जरूर करूँगा।यही सोचकर राजा सड़क से गुजर ही रहा था कि उसे एक भिखारी दिखाई दिया। राजा को भिखारी की दशा देखकर बड़ी दया आई। उसने भिखारी को अपने पास बुलाया और उसे एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी सिक्का लेके बड़ा खुश हुआ, अभी आगे चला ही था कि वो सिक्का भिखारी के हाथ से छिटक कर नाली में गिर गया। भिखारी ने तुरंत नाली में हाथ डाला और सिक्का ढूंढने लगा।राजा को बड़ी दया आई कि ये बेचारा कितना गरीब है, राजा ने भिखारी को बुलाकर एक सोने का सिक्का और दे दिया। अब तो भिखारी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने सिक्का लिया और जाकर फिर से नाली में हाथ डाल के खोया सिक्का ढूंढने लगा।राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने फिर भिखारी को बुलाया और उसे एक चांदी का सिक्का और दिया क्यूंकि राजा ने खुद से वादा किया था कि एक इंसान को खुश और संतुष्ट जरूर करेगा। लेकिन ये क्या ? चांदी का सिक्का लेकर भी उस भिखारी ने फिर से नाली में हाथ डाल दिया और खोया सिक्का ढूंढने लगा।राजा को बहुत बुरा लगा उसने फिर भिखारी को बुलाया और उसे एक और सोने का सिक्का दिया। राजा ने कहा – अब तो संतुष्ट हो जाओ। भिखारी बोला महाराज, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूँगा जब मुझे वो नाली में गिरा सोने का सिक्का मिल जायेगा।दोस्तों हम भी, आप भी , दुनिया का हर अमीर - ग़रीब भी उस भिखारी की ही तरह हैं और वो राजा हैं भगवान है । अब भगवान हमें कुछ भी देदे हम संतुष्ट हो ही नहीं सकते। ये मेरी या आपकी बात नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में मानव जाति कभी संतुष्ट नहीं हुई है।संतुष्टि नही होने के कारण आज समाज परिवार में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहती है।हत्या , लूट सहित हर तरह की आपराधिक घटनाएँ नित्य दिन समाज में देखने सुनने को मिलती रहती है। कोई अपने परिवार से कोई अपने बच्चे से तो कोई अपने जीवनसाथी से संतुष्ट नही है।जो सबके पीड़ा का कारण है।सबको अधिक पैसा चाहिए, पैसा मिले तो अब कार चाहिए, कार मिले तो और महँगी कार चाहिए, दुनिया समाज में जो भी अच्छा दिखे उसको चाहिए। स्वर्ग की अनुभूति और आनंद चाहिए। सारी चीझे हर इंसान के अंदर संतुष्टि के रूप में है पर देखने की कोसिस नही करता है।जो इंसान के जीवन की पूरी यात्रा में यही क्रम चलता रहता है।भगवान ने हमें ये अनमोल शरीर दिया है लेकिन हम जिंदगी भर नाली वाला सोने का सिक्का ही ढूंढते रहते हैं। आप चाहे कितने भी अमीर हो जाओ, चाहे कितना भी धन कमा लो आप संतुष्ट नहीं हो सकते।इस संसार में ए सत्य है कि स्वयं इंसान स्वयं से संतुष्ट नही है।जो उसके तनाव , पीड़ा का मुख्य कारण है।आज हम सभी इंसान इस अनमोल पावन शरीर को पाकर भी हम संसार रूपी नाली से सिक्के ही ढूढ़ते रहते हैं।दोस्तों भगवान के दिए इस शरीर रूपी धन का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करें और संतुष्टि को तलाशे तो निश्चित आनंद रूप में संतुष्टि मन के अंदर दृष्टिगोचर होगी।संतुष्टि स्थायी नहीं होती यह अस्थायी व समयानुसार इंसान के जीवन सफ़र में सुख-दुःख, हर्ष आते जाते रहता है।इंसान हर पल को अपने सोच को संतुष्टि के रूप में ढाल ले तो पीड़ा की अनुभूति नही होगी।इंसान तुमको इस दुनिया में अगर सब कुछ मिल जाएगा ज़िंदगी मे तो तमन्ना किसकी करोगे। जीवन में कुछ अधूरी ख्वाइशें तो ज़िन्दगी जीने का मज़ा देती है।आज कोरोना महामारी के कारण विश्व, राष्ट्र, समाज में आर्थिक मंदी उत्पन हो जाने से भुखमरी एवं भीखक्षाटण के राह पर समाज के ग़रीब , मज़दूर चल पड़े है।यदि समाज के सक्षम इंसान सहयोग ,सहायता के लिए आगे बढ़े तो स्वयं के संतुष्टि , आनंद की अनुभूति होगी।आज के वक्त में भूखा सो रहा है अपने घर में । भूख क्या होती है उनसे बेहतर कौन जान सकता है। हम सभी से निवेदन करता हु कि गरीबो का दर्द समझिए और निःस्वार्थ सेवा कीजिए ताकी जीवन में आपको संतुष्टि मिले। सेवा करने से कोई छोटा नहीं होता।अतीत के पन्ने पलटेंगे तो देखेंगे कि अपना समाज यही सिखलाया गया है।सेवा करो फल भगवन देगा । इंसान हम तुम दरिया हैं, अपना हुनर मालूम है।संतुष्टि के साथ जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा जो सुखी जीवन के मंज़िल पर पहुँचाएगा।जीवन यात्रा में खुद से प्यार करना संतुष्टि, खुशी का पहला रहस्य है।इस रहस्य को हमेशा अपने अंदर जीवंत रखना है।हर इंसान अपने जीवन को एक मास्टरपीस बनाए।अपने अंदर विश्वास पैदा करे कि मैं इस ग्रह पर अब तक का सबसे बड़ा व्यक्ति हूँ।अंत में कहूँगा :- चमक सूरज की नहीं इस दुनिया में हर इंसान किरदार की है, खबर ये आसमाँ के अखबार की है,तू चले तो तेरे संग कारवाँ चले, बात गुरूर की नहीं, तेरे अंदर संतुष्टि रूपी मौजूद ऐतबार की है.
ग्रामीण पत्रकारिता, राजनीति और समाज पर विशेष
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अयोध्या, 21 मई 2020, (आरएनआई)। ग्रामीण पत्रकार एक सजग प्रहरी बनकर गरीबों, मजलूमों, मजदूरों, असहायों की सेवा करता है किंतु इस प्रकार की सेवाएं देने वाले सेवकों का कोई नहीं होता, आखिर ऐसा खेल कब तक चलेगा,कि एक सच्चे समाज सेवक को लोग कब तक गिरी हुई नजरों से देखा जाएगा। ग्रामीण पत्रकारिता करना मतलब जान जोखिम में डालना है एक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार से नफ़रत करने वालों की कमी नहीं है। जबकि सच्चाई ये है कि गांवों से जो भी नेता बनकर उभरा है उसको एक पत्रकार ने ही बनाया है यदि किसी सरकारी विभाग में मेहनत के बल पर किसी पद पर तैनाती यदि किसी को मिली है तो उसका नाम पत्रकार ही आगे बढ़ाने वाला है। जिसके बल पर लोग शादी तक में लड़की वालों को दहेज रूपी लोभ के हथियार से लूटते हैं, लेकिन कहीं एक पत्रकार ने उन्हीं लोगों के कुछ ग़लत करने पर समाचार प्रकाशित किया तो उस पत्रकार से बड़ा उनका दुश्मन कानून की कलम चलाने वाला अधिकारी नहीं है जिसकी कलम से संबंधित ब्यक्ति को सजा मिलती है।दोष तो केवल और केवल एक सच्ची पत्रकारिता करने वाले का ही माना जाता है। छुटभैय्ए नेताओं को पत्रकार ही जमीं से उठाकर आसमान तक पहुंचाता है। किंतु बड़े पद पर पहुंचने के बाद यही नेता पत्रकार के साथ साथ आम जन के उन लोगों को भी भूल जाते हैं जिनके वोटों से ये जनप्रतिनिधि कहलाने योग्य बनते हैं।ग्राम पंचायत सदस्य के चुनाव से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक किसी को बनाने में एक पत्रकार की अहम भूमिका होती है लेकिन पदवी व रुतबा हासिल होने के संबंधित ब्यक्ति उस पत्रकार को जरूर भूल जाता है जिसकी कलम की धार के उसे सफलता मिली होती है। गांवों में गरीबों हक कोटेदार मारे तो उसका पत्रकार दुश्मन, प्रधान के विरुद्ध सच्चाई लिखे तो उसका पत्रकार दुश्मन, किसी भी जनप्रतिनिधि के विरुद्ध सच को लेकर कलम चले तो उसका पत्रकार दुश्मन,शिक्षक समय से विद्यालय न पहुंचे तो उसका पत्रकार दुश्मन,नाली,खड़ंजा, चकमार्ग, खलिहान, तालाब या अन्य प्रकार की सरकारी जमीन पर किसी का अवैध कब्जा हो तो उसको लेकर कलम चलाने उसका पत्रकार दुश्मन, किसी सरकारी विभाग का कोई अधिकारी, कर्मचारी गलत या भ्रष्टाचारी करे तो सच लिखने वाला पत्रकार ऐसे लोगों का दुश्मन,राह चलते दादागिरी करने वालों के विरुद्ध कलम चलाने वालों का पत्रकार दुश्मन,सच तो ये है कि पत्रकारों के दुश्मनों की कमी नहीं है, और जिसका आज तक कोई दुश्मन न हो सब छोड़ कर सच्चाई और ईमानदारी की कलम पकड़कर पत्रकारिता करने लगे सच कहता हूं दुश्मनों की कतारें लग जाएंगी बिन बुलाए बिन बनाए दुश्मनों की फौज खड़ी हो जाएगी। ये फौज क्या क्या कर डालेगी मालूम नहीं। वैसे घटिया तरीके की सोच का शिकार ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकार होते हैं इन्हीं को उक्त प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।सबसे जोखिम भरी पत्रकारिता ग्रामीण क्षेत्रों की है, लेकिन ये मैं देख रहा हूं कि अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों से कलम के सिपाही भी निकलते हैं, और अपनी कलम की पैनी धार से वार करने से नहीं चूकते और इन सिपाहियों को अंजाम की परवाह नहीं रहती। लेकिन कुछ चमचाबाज पत्रकार हैं जो अच्छे पत्रकारों की साख मिट्टी में मिलाए बैठे हैं। ऐसे पत्रकारों को मैं न पसंद करता हूं न इनसे कोई संबंध रखता हूं,मैं तो मां सरस्वती की कृपा से देश व समाज की सेवा करता हूं यही मुझे पसंद है। मैं उन पत्रकार वंधुओं को सदा नमन करता हूं जो सच लिखने का जज्बा रखते हैं और सच्चे कलम के सिपाही हैं, वह सच्चे देशभक्त हैं!
बिहार पुलिस एसोसिएशन का शताब्दी सफ़र
Rupesh Kumar 2020-05-20 17:38:42
पटना, 20 मई 2020, (आरएनआई)। शताब्दी वर्ष का सफ़र पुलिस एसोंसीएशन के अतीत, वर्तमान के साथ भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है।मानव सभ्यता के इतिहास को दर्पण के रूप में देखगे है तो दृष्टिगोचर होगा कि मानव जाती में अपने अतीत को जानने एवं समझने की जिज्ञासा होती है।भारत ग़ुलामी के ज़ंजीरो में जकड़ा ब्रिटिश हुकूमत द्वारा अत्याचार बर्बरता को झेल रहा था।उस वक़्त देश में कनिय पुलिसकर्मियों में अधिकतर भारतीय थे जिनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी ख़राब थी। उनके मूलभूत समस्या की अनदेखी हो रही थी। कुछ पुलिसकर्मी भारत के आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने लगे जिससे आज़ादी के आंदोलन को एक नई ऊर्जा मिली।इसकी जानकारी जब इंग्लैंड की सरकार को मिली तो चिंतित होकर बोली की पुलिसकर्मी एक संगठन बनाकर अपनी समस्या को रखे।विश्व के मंच पर जब पुलिस के इतिहास का पन्ने पलट्टे है तो भारत की धरती पर अनुशासन के इस विभाग में 20 मई 1920 कोलकाता के हावड़ा मैदान में देशभर से जुटे पुलिसकर्मियों द्वारा पुलिस एसोसिएशन की निव रखकर स्थापना की गई।प्रारम्भिक दौर में पुलिस के सभी पंक्ति के लिए पुलिसकर्मीयो के समस्या समाधान एवं कल्याणकारी कार्यों के लिए ए संगठन बना था।15 जनवरी 1921 को बिहार तथा उड़ीसा प्रान्त के कनीय पुलिस पदाधिकारियों की एक सभा पटना में आयोजित की गई।26 मई 1921 को पूरे भारत वर्ष के पुलिसकर्मियों की एक विशेष सभा का आयोजन किया गया।उस सभा में ब्रिटिश इंडिया पुलिस एसोसिएशन के गठन का संकल्प प्रस्ताव लिया गया।भारत के मद्रास प्रान्त को छोड़ कर सभी प्रान्त के प्रतिनिधि भाग लिए।सभा में यू पी पुलिस एसोंसीएशन के तत्कालीन अध्यक्ष अभियोजन निरीक्षक लाल सरयू प्रसाद को उस विशेष सत्र का अध्यक्ष चुना गया।बिहार तथा उड़ीसा पुलिस एसोंसीएशन के आरक्षी निरीक्षक आर गाडफ़े उस सत्र के उपाध्यक्ष चुने गए।महामंत्री और कोषाध्यक्ष पद मध्य भारत के पुलिस सदस्यों को दिया गया।वर्ष 1924 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा औपचारिक तौर पर पुलिस एसोंसीएशन की मान्यता प्रदान की गई । 1936 में उड़ीसा को अलग राज्य का दर्जा मिलने के बाद बिहार पुलिस एसोंसीएशन अस्तित्व में आया।समय के साथ एसोसिएशन के पद्धारक अपने सदस्यों के लिए कल्याणकारी कार्य करते रहे है। तेरह माह का वेतन , मकान भाता,वाहन, वर्दी भाता की बढ़ोतरी सहित अनेको उपलब्धि एसोंसीएशन के नाम है। एसोसिएशन के प्रति सदस्यों की निष्ठा संघ की मूल शक्ति है।आज भी पुलिस एसोसिएशन अपने सदस्य पूर्वजों जो समय के साथ पुलिस एसोंसीएशन को सींचते और मज़बूत बनाते रहे उन्हें ह्रदय से नमन और आभार व्यक्त करता है। साथ ही आज के वर्तमान वक़्त में पूरी देश के सभी राज्यों में पुलिस संगठन की माँग करता हु।पुलिस एसोंसीएशन में समय के साथ पदधारक की संख्या बढ़ती गई।वर्तमान में अध्यक्ष,महामंत्री के अलावा दो उपाध्यक्ष,दो संयुक्त सचिव, एक कोषाध्यक्ष का पद है।ज़िला इकाई में पाँच पद होता है।तीन वर्ष पर पारदर्शी रूप से चुनाव मंडल का गठन करके मतदान होता है।इस बार चार वर्ष के कार्यकाल का प्रस्ताव आमसभा से पास हूवा है।5 फ़रवरी 2011 से मैं ( मृत्युंजय कु सिंह) चुनाव में विजय होकर प्रदेश अध्यक्ष हु.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
सियासी ख़ैरात पर बिकते-बिकते कहां आ गए हम? क्या मजदूरों की इस हालत के लिए सिर्फ़ सरकार ज़िम्मेदार है?
Root News of India 2020-05-18 22:15:12
नई दिल्ली, 18 मई 2020, (आरएनआई)। देश की आबादी करीब सवा अरब है। इस आबादी का 37 फ़ीसदी हिस्सा मज़दूरी के लिए पलायन करने को मजबूर है। 37 फ़ीसदी के हिसाब से मज़दूरों की ये तादाद क़रीब 46 करोड़ 25 लाख के आस-पास बैठती है। अब जबकि कोरोना की महामारी ने सांसें अटका दी हैं, यही बेचारे मज़दूर कोरोना से नहीं, बल्कि भूख से बचने के लिए अपने-अपने गांवों की और फिर से पलायन करने लगे हैं।
मध्यम-वर्ग
Root News of India 2020-05-15 10:21:58
मध्यम-वर्ग***मध्यम वर्ग, परिवार की,
कोरोना महामारी के बीच उठकर आया एक सख्श
Rupesh Kumar 2020-05-05 15:43:56
बेगूसराय, 5 मई 2020, (आरएनआई)। कोरोना-संक्रमण को लेकर जहाँ पूरा समाज और पूरा विश्व अपने-अपने घर में दुबका है और हरेक आने-जाने वालों के साथ एक शारीरिक-दूरी बनाकर खुद की जिंदगी को सुरक्षित और संरक्षित रखने को आमादा है, वहीं कुछ ऐसे सामाजिक- योद्धा हैं, जिन्होंने अपनी लगन और अपनी सेवा भावना से मानवीय-मूल्यों को जिस प्रकार सहेजने का काम किया है, वह काबिले-तारिफ है.
महिला सशक्तिकरण की अनूठी मिसाल है ममता मेहरोत्रा
Rupesh Kumar 2020-05-05 15:39:00
पटना, 5 मई 2020, (आरएनआई)। लखनऊ में जन्म हुआ परवरिश व शिक्षा- दीक्षा भी लखनऊ में ही हुई. लरुटो कॉन्वेंट से मैंने 12 वीं तक की पढ़ाई की फिर लखनऊ में ही आई. टी. कॉलेज से साइंस में ग्रेजुएशन किया. मेरी शादी 1991 में हुई. शादी के बाद मैं बिहार आ गयी क्यूंकि मेरे पति सरकारी जॉब में हैं और नौकरी के संदर्भ में ही उनको बिहार आना पड़ा. सबसे पहले उनकी पोस्टिंग बिहार के साहिबगंज जिले में हुई. वहीँ से मैंने अपने जीवन की बिहार में शुरुआत की. फिर बिहार ही मेरी कर्मभूमि हो गयी. यहाँ रहते हुए मुझे 28-29 साल हो गए. मैं यह नहीं जानती कि मैं बिहारवासी हूँ कि मैं यू.पी. की हूँ. क्यूंकि मैं अपने काम की वजह से बिहार को रिप्रजेंट करती हूँ इसलिए खुद को बिहारी मानती हूँ. लिखने-पढ़ने का मेरा शुरू से शौक रहा. अमूमन शादी के बाद एक कामकाजी महिला के जीवन में एक ठहराव आ जाता है क्यूंकि वह कोई भी काम करती है तो शादी के बाद उसके ऊपर बहुत सी जिम्मेदारियां आ जाती हैं जो उसके लिए बिल्कुल नयी होती हैं. ससुराल में आपके बहुत सारे ऐसे कार्य होते हैं जो नयी बहू के तौर पर करने पड़ते हैं, उन जिम्मेदारियों को समेटना पड़ता है. शादी के तुरंत बाद मैं माँ बनी और मुझे एहसास हुआ कि बच्चे की परवरिश अपने आप में बहुत ही कठिन कार्य है. इस दरम्यान मेरी आगे की पढ़ाई-लिखाई सब रुक गयी और 10 सालों तक मैं कुछ भी नहीं कर पाई. इसी क्रम में करीब 1997 में मैंने जूलॉजी में पीजी किया. तब तक मेरी कविता-कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में छपनी शुरू हो गयी थीं. यहाँ मेरे व पति के अलावा ससुराल का कोई नहीं था, मुझे अकेला ही सब संभालना पड़ा और बच्चों को सँभालने में थोड़ी दिक्कत हुई जिसकी वजह से मुझे हर प्रकार से पढ़ाई में, लेखन में, सामाजिक कार्यों में थोड़ा रुक जाना पड़ा. तब मेरी जो एक पर्स्नालिटी है वो कहीं ना कहीं सिर्फ घर की चार दीवारी के अंदर जिम्मेदारियों तले दबकर रह गयी. सब समझते हैं कि शादी का अर्थ हो गया कि अब आप एक बहुत परिपक्व व्यक्ति हो गएँ. तो उसमे अपने जीवन से जुड़े हुए लोगों के प्रति आपकी नैतिकता बढ़ जाती है. शादी बाद बिहार के एक छोटे से जिले साहिबगंज में मेरा एक साल व्यतीत हुआ. कहाँ मैं लखनऊ में थी और कहाँ मैं साहिबगंज में आ गयी. तब पति के ऊपर कार्य की इतनी ज्यादा जिम्मेदारियां थीं कि वो घर में समय नहीं दे पाते थें. हमलोग एक कमरे के घर में रहते थें. उसी में हमारा किचन भी चलता था. एक तरीके से मेरा सारा दिन घर के अंदर ही बीत जाता था. तब मैंने सपने देखना ही छोड़ दिया था. आँखों के अंदर भी वो तैरते नहीं थें क्यूंकि लगता था कि इतना काम बाकि है, इतना कुछ करना बाकि है कि पहले ये तो खत्म करें. धीरे-धीरे करके मैंने आगे की पढ़ाई पूरी की. चूँकि पढ़ने का शौक शुरू से रहा है इसलिए स्वध्याय मैं आज भी कर रही हूँ. मुझे उम्र के इस पड़ाव पर भी पढ़ने का, डिग्री लेने का, निरंतर आगे बढ़ने का जुनून है. मैं आज भी अपने आप को एक विद्यार्थी ही मानती हूँ. तो कहीं-न कहीं वो सीखने की प्रक्रिया आज भी चल रही है जिसकी वजह से अंदर से मैं अपने आप को बहुत जवां महसूस करती हूँ. साहेबगंज के बाद लम्बी यात्रा शुरू हो गयी. वहां से गया, बेतिया, छपरा, मुजफ्फरपुर, लोहरदग्गा, चाईंबासा, जमशेदपुर, पटना कई जगहों पर पति के ट्रांसफर की वजह से घूमती रही. मेरी लाइफ में टर्न आया गया जिले से. गया आते-आते मेरे दोनों बच्चे थोड़े बड़े हो गए थें. तब एक तरीके से अपने आप को मानसिक रूप से स्वतंत्र महसूस करने लगी. उसी स्वतन्त्रता के दौरान मैंने पुनः लेखन कार्य शुरू किया. मेरी पहली पुस्तक (कहानी संग्रह) 2005 में आई. मेरा एक कहानी संग्रह ‘माटी के घर’ का आठ भाषाओँ में समीक्षा हो चुकी है जिसको लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में स्थान मिल चुकाजब मैं मुजफ्फरपुर में थी 2001 से मैंने शिक्षण कार्य भी शुरू कर दिया. पटना आना हुआ 2005 के आस-पास उसके बाद हमलोग पटना में ही रह गए. सामाजिक कार्य मैंने 1993 से ही शुरू कर दिया था. हमलोग गांव-गांव जाकर महिलाएं के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप बनातें थें. उस समय ये नई बात थी, नयी-नयी सोच थी. इसको हमलोग एक मुकाम देने की कोशिश करते थे कि जो गांव की महिलाएं हैं उन्हें किस तरह से आत्मनिर्भर बना सकें. सामाजिक कार्य की शुरुआत मुजफ्फरपुर से हुई थी. तब हमलोगों का कोई एन.जी.ओ. नहीं था. और अभी भी मैं किसी एन.जी.ओ. के तहत कुछ नहीं कर रही. 2002 से मैंने घरेलू हिंसा केस के लिए इण्डिया में पहली वूमेन हेल्प लाइन शुरू की. 2005 में घरेलू हिंसा अधिनियम आया लेकिन मैं इसपर 2002 से ही कार्य कर रही हूँ. मैंने कम से कम 1000 घरेलू हिंसा के मामलों को सहजता पूर्वक सुलझाया है. इसके ऊपर मेरी एक किताब है इंग्लिश में जिसका नाम है (We Wemen) जिसमे मेरे निजी अनुभव हैं. मैं अलग-अलग एन.जी.ओ. से जुड़कर कार्य करती हूँ. इन सामाजिक कार्यों के लिए मुझे कई अवार्ड भी मिलें. कभी भी एक महिला घर की चार-दीवारी छोड़कर बहार आती है तो उसके ऊपर तरह-तरह के आक्षेप लगते हैं. पहली बात तो लोग ये सोचते हैं कि एक महिला जो घर में सुख से रह सकती है उसे क्या ज़रूरत पड़ी है बाहर जाने की. तो एक औरत के लिए सबसे पहला स्ट्रगल वहीँ से शुरू हो जाता है. क्यूंकि जब आप घर की चार दीवारी लांघते हैं तो जैसे देवी सीता के लिए कहा गया था ना कि ये लक्ष्मण रेखा है इसको नहीं लांघना है, वैसे ही महिलाओं के लिए घर की चार दीवारी लक्ष्मण रेखा है. उसको जब आप लांघते हैं तो अनेक रावण जो आपके आस-पास घूमते रहते हैं वे कई प्रकार से अपने बाणों द्वारा आपको घायल करते रहते हैं. लेकिन कार्यक्षेत्र में मुझे अपने पति से बहुत सहयोग मिला. किसी भी कार्य में उनका हस्तक्षेप नहीं रहता. मगर फिर भी मुझे बाहर जगह बनाने के लिए झूझना पड़ा. अपनी समकक्ष महिलाओं के ताने भी सहने पड़े. जब आपको उपलब्धियां मिलने लगती हैं तो आप ही के आस-पास की महिलाएं जो ये स्वीकार ही नहीं कर पाती हैं कि अरे कोई महिला कैसे आगे बढ़ रही है. अगर मैं मेहनत करके, सही काम करके अपना जीविकोपार्जन कर रही हूँ तो ये भी बहुत सारी महिलाओं को बर्दाश्त नहीं होता है.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष कलम से - ईश्वर की प्रार्थना, सहायता, आभार जीवन मार्ग
Rupesh Kumar 2020-05-04 19:15:37
पटना, 4 मई 2020, (आरएनआई)। ईश्वर के प्रार्थना की शक्ति का महत्व, ज़रूरतमंद का निश्छल भाव से सहायता और ईश्वर को हृदय से आभार को सभी धर्मों के अलावा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है।इससे इंसान के बेहतर जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।हम सभी ज़िंदगी के सफ़र में काश कितने लोग कहते है कि तेरे दर्द से मुझे भी तकलीफ होती हैं।ईमानदारी से समीक्षा करने पर अपवाद दृष्टिगोचर होता है।संकट में अंततः ईश्वर प्रार्थना, आभार एवं सहायता भाव मन मस्तिष्क और जुब्बा पर आती है।ईश्वर की प्रार्थना हम सभी जब संकट या दलदल में फँसे रहते है तो निश्चित रूप से करते है।कभी-कभी सोचता हूँ कि जिंदगी हमें चलाती है या हम उसे चलाते है।क्या जिंदगी में बस वहीँ सब होना चाहिए जो केवल और केवल हम चाहते है।क्या जिंदगी में सबकुछ खुशी ही होती है या दुःख का मतलब भी समझ में आना चाहिए।ज़िंदगी में ज़रूरतमंद की सहायता भाव क्यों शिथिल भाव में रहता है।हमें कभी-कभार अंदाजा भी नही लग पाता कि जिंदगी को हमसे क्या चाहिए और हम उसे क्या दे रहे हैं।हमारे कुछ फैसले, उन नतीजों तक लेकर जाते हैं जिसकी कल्पना हमने नही की थी।फिर दोष किस पर डालें जिंदगी पर या अपने कर्म पर या जिसने ज़िंदगी दिया उस पर।जिंदगी के सफर में हम कुछ राहें चुनते हैं, फिर मंजिल की खोज में आगे बढते हैं।पर मंजिल का कोई अता-पता नही होता तो राहें गलत थी या हमारा फैसला इस पर कभी हम नही सोचते ।जो हमें ईश्वर दिए है उससे ख़ुश होना चाहिए।उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।पर धन्यवाद करते है तो कब करते है कभी ध्यान दे कर सोचे।सृष्टि के हर कालखंड में ईश्वर अवतार,ऋषि मुनि , नर, दानव ईश्वर की प्रार्थना पूजा करते थे और उनसे वरदान प्राप्त कर कई शक्तियाँ प्राप्त करते थे।प्रभु श्रीराम किसी भी शुभ कार्य करने के पहले ईश्वर की पूजा आराधना करते थे।ज़रूरतमंद को सहायता करते थे और साथ ही धन्यवाद भी व्यक्त करते थे।इंसान चार शब्दों की उच्चतम प्रार्थना के कितना क़रीब होता इस पर ज़रा गम्भीरता से सोचिए।एक कहानी बताता हु :-एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था। मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया। अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया।वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए। इस बीच वह प्रार्थना भूल गया। जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी”। उसने बहुत याद किया परन्तु उसे याद ही नहीं आया।अब वह लोगों से पूँछने लगा।पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, ईश्वर मेरी मदद करो। उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे। कुछ सुना होता तो हमें जाना-पहचाना सा लगता। फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ। फिर एक फादर से मिला तो फ़ादर बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा। फिर वह एक नेता से मिला और पूछा तो उसने कहा “ ईश्वर को वोट दो “ होगा परन्तु यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई।वह बहुत उदास और चिंतित हो गया। उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी। वह हार थाक कर उदास होकर घर में बैठा हुआ था तभी एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया।उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद “ अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया की अरे! यही तो वह चार शब्द थे जो मेरे पिता जी बताए थे। उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए “ हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद” और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।इससे समझें की जब उसने निश्चल भाव से किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया ।यही उच्च प्रार्थना जीवन मार्ग है,क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है ।अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है।बहुत अच्छे दिन आएंगे या नहीं यह तो मुझे नहीं पता पर जो नियमित रोज ईश्वर का प्रार्थना करेगा किसी ज़रूरत मंद को सहायता करेगा उस के बुरे दिन कभी नहीं आएंगे।बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं।मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता।ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं।अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, ईश्वर तुम्हार धन्यवाद। ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं,” धन्यवाद”।आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया।इंसान जीवन में कभी भी कोई शुभ कार्य या सफलता के लिए किसी मंज़िल की तलाश में निकलता है तो निश्चित रूप से ईश्वर की प्रार्थना करता है। साथ ही सफलता मिलने पर धन्यवाद व्यक्त भी करता है।वक़्त से हारा या जीता नहीं जाता केवल सीखा जाता है फिर सीख कर ज़िंदगी को फिर जीता जाता है।हे इंसान सत्य निष्ठा से स्वयं से कभी पूछों कि सुबह से शाम, दिन से रात तक ईश्वर प्रार्थना में तुम्हारा दिल कितनी बार धड़कता है।किसी ज़रूरत मंद को निस्वार्थ भाव से कितने लोगों की सहायता करते है। हे इंसान जिंदगी के मायने दूसरो से मत सीखो क्योंकि जिंदगी आपकी है और ईश्वर की प्रार्थना उपरांत आभार व्यक्त कर मायने भी आपको ख़ुद तय करना है।ईश्वर भक्ति, ज़रूरतमंद की सहायता एवं उनका धन्यवाद करके बेहतर ज़िंदगी का अजय दुर्ग बना लीजिए.
संघर्ष का दूसरा नाम -पद्म श्री राजकुमारी देवी
Rupesh Kumar 2020-04-29 20:08:14
पटना, 29 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। हमारे समाज में शुरू से हीं खेती पर पुरुषों का एकाधिकार समझा जाता रहा है , लेकिन अब ऐसी बात नहीं है | बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसी दर्जनों महिलाएं हैं जो खेती के जरिए सोहरत और पैसा दोनों कमा कर साबित कर दिया है की गृहणियां भी अगर ठान ले तो कुछ भी कर सकती है | इन्हीं महिलाओं में से एक हैं बिहार के मुजफ्फरपुर के आनंदपुर गांव निवासी राजकुमारी देवी, जिन्हें लोग प्यार से ‘किसान चाची’ के नाम से भी जानते हैं.
आशा की किरण जगा रहे है शिक्षाविद मुन्ना जी
Rupesh Kumar 2020-04-29 20:06:52
पटना, 29 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। आज के अर्थवादी युग में जहा एक तरफ पैसे के पीछे सारी दुनिया भाग रही है वही बिहार कि राजधानी पटना में एक ऐसे युवा भी है जो उच्च सिक्षा ग्रहण करने के बाद कोचिंग सञ्चालन के क्षेत्र में पैसा कमाने के लिए नही बल्कि गरीब छात्रों के सपने साकार करने में लगे है .इनके यहाँ से महज एगारह रुपये की गुरु दक्षिणा में हजारो छात्र बिभिन प्रतियोगिता परीक्षाओ में सफलता प्राप्त कर चुके है .हम बात कर रहे है पटना के नयाटोला गोपाल मार्किट अवस्थित एम सिविल सर्विसेस संसथान की .इसके संचालक मुन्ना जी वर्ष 2002 से न्यू पाटलिपुत्रा और एम सिविल सर्विसेस नामक दो निजी कोचिंग संस्थानों का सफलता पूर्वक सञ्चालन कर रहे है इनके संसथान में सिविल सर्विसेस से लेकर अन्य सरकारी नौकरी की भी तैयारी करवाई जाती है .मूल रूप से नवादा जिले के निवासी शिक्षाविद हरी प्रसाद जी जो बाल भारती मध्य विद्यालय स्टेशन रोड नवादा के प्रधानाध्यापक है के पुत्र मुन्ना जी की माता श्रीमती सीता देवी धर्म परायण महिला है .दो भाई व दो बहनों के परिवार में सबसे छोटे मुन्ना बचपन से ही पढने में कुशाग्र बुद्धि थे .प्राम्भिक शिक्षा नवादा व कॉलेज की पढाई पटना के एन कॉलेज से पूरा करने वाले मुन्ना जी पी एच डी कर रहे है .सॉफ्टवेअर इनजीनियरिंग की भी पढाई इन्हों ने की है .(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से पढ़िए फुर्सत के क्षण
Rupesh Kumar 2020-04-27 17:56:12
पटना, 27 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। आदत इंसान के जीवन का एक अनसुलझी रहस्य है।कुछ अपवाद छोड़ दिया जाए तो जीवन के अंतिम पल तक इंसान से जूड़ा रहता है।आदत किसी प्राणी के उस व्यवहार को कहते हैं जो बिना सोच के बार-बार दोहराया जाये।जिससे वो अनभिज्ञ होता है।बचपन में जो इंसान कुछ अच्छी या बुरी ज्ञान, आचरण , व्यवहार , शब्द अपने जीवन में जोड़ता है वो सभी इंसान की दिनचर्या आदत में शामिल हो जाती है। जीवन सफ़र के किसी भी पड़ाव में कुछ ऊपर लिखित आदतें इंसान से जुड़ जाती है।कुछ दिन पहले कुछ मित्रों के साथ बैडमिंटन सचिवालय में जाकर खेलना प्रारम्भ किया जो आदत में बदल गई। खेलने जाने एवं खेलते समय सब कुछ भूल कर शरीर के अंदर , मन में क्रियाए क्रियात्मक रूप में कुछ आदतें आभास कराने लगती है।मानवों में कई तरह की आदत दृष्टिगोचर होती है।खेलने के बाद लौटते समय धूम्रपान की आदत हम अपने मित्रों में देखते है।हम बोलते है कि सिगरेट पीना स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है नही पीना चाहिए पर वो नही मानते और बोलते है आदत पड़ गई है।जानवरों में भी आदतें बहुत देखी जाती हैं।मसलन किसी कुत्तें को घंटी बजते ही दुम हिलाने की आदत पड़ सकती है क्योंकि उसका मालिक घर आकर घंटी बजाता है।किसी भी कार्य को अगर लगातार किया जाए तो वह कार्य हमें आसान, मनोरंजक और लुभावना लगने लगता है।उसे करना पसंद आने लगता है जिसे हम आदत कहते है, चाहे वह कार्य हमें अच्छे मार्ग पर ले जाता हो या बुरे मार्ग पर।एक बार किसी चीज़ का आदत लग लाने पर उसे छोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है अतः अनजाने में हमें बुरा आदत ना लगे इसी लिए हमें जान बूझ कर अच्छी आदत डालनी चाहिए।एक कहानी आपको बताता हु जो गहरा ज्ञान का दर्शन कराएगा। एक नदी में बाढ़ आती है।छोटे से टापू में पानी भर जाता है वहां रहने वाला सीधा साधा एक चूहा कछुवे से कहता है मित्र क्या तुम मुझे नदी पार करा सकते हो मेरे बिल में पानी भर गया है?। कछुवा राजी हो जाता है तथा चूहे को अपनी पीठ पर बैठा लेता है। तभी एक बिच्छु भी बिल से बाहर आता है कहता है मुझे भी पार जाना है मुझे भी ले चलो। चूहा बोला मत बिठाओ ये जहरीला है ये मुझे डंक मार देगा।तभी समय की नजाकत को भांपकर बिच्छू बड़ी विनम्रता से कसम खाकर प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहता है “भाई कसम से नही डंक मरूँगा बस मुझे भी ले चलो”। कछुआ चूहे और बिच्छू को लेकर तैरने लगता है।तभी बीच रास्ते मे बिच्छु चूहे को डंक मार देता है।चूहा चिल्लाकर कछुए से बोलता है "मित्र इसने मुझे डंक मार दिया अब मैं नही बचूंगा”। थोड़ी देर बाद उस बिच्छू ने कछुवे को भी डंक मार दिया। कछुवा मजबूर संस्कारवान था जब तक किनारे पहुंचा चूहा मर चुका था।कछुआ बोला मैं तो इंसानियत से मजबूर था तुम्हे बीच मे नही डुबोया मगर तुमने मुझे क्यों डंक मार ?। बिच्छु उसकी पीठ से उतरकर जाते जाते बोला मूर्ख तुम जानते नही मेरा तो “ आदत “ ही है । गलती तुम्हारी है जो तुमने मुझ पर विश्वास किया ठीक इसी तरह कोरोना की इस बाढ़ में मोदी जी ने भी अपने राष्ट्र, कर्तव्य धर्म निभाते हुए कोरोंना महामारी रूपी नदी पार करवाने के लिए सभी को पीठ पर बिठा लिया है।कुछ लगातार डंक मार रहे है।इसी तरह एक नदी किनारे पानी में बिछु बहता जा रहा था।एक ऋषि कुछ शिष्यों के साथ नदी किनारे थे।जब बिछु को पानी में बहते एवं निकलने का असफल प्रयास देख कर उसे अपने हाथ से निकालने लगे तो बिछु ऋषि को लगातार डंक मार देता था।इस दृश्य को देख कर शिस्यगण अपने गुरु से बोले कि बार बार आपको डंक मार रहा है और आप लगातार इसे निकाल कर बचाने की कोसिस कर रहे है।ऋषि अपने शिष्यों से बोले की जब बिछु अपना आदत को नही छोड़ रहा तो हम अपनी बचाने की आदत को कैसे छोड़ दूँ ।उसी तरह सरकार भी अपने कर्तव्य, न्याय , जन कल्याण, इन्सानियत विकास की खातिर आदत से कर्तव्यरत हैं।कुछ आदत से बेचारे निर्दोष डॉक्टर, पुलिस और स्वास्थ्यकर्मी पर हमला कर रहे है और वे सभी हमला की पीड़ा को देखते सहते अपने कर्तव्य धर्म पर दृढ़ प्रतिज्ञा के तहत सपथ के साथ संकल्पित होकर गतिमान है । हर मनुष्य का अपना-अपना आदत व्यक्तित्व में शामिल हो जाता है।कई लोगों को आप आदत सुधारने के लिए बोलिएगा तो वे आश्वासन देने के बाद भी वे मानते नही है।किसी से बोलिए की फ़ेसबूक , वात्सप या मसेंजर पर चैट से दूर रहिए तो वे आदत से दूर नही हो पाते है।कुछ इंसान लोग कहते थे कि पुलिस चौराहो पर कमाई के लिए खड़ी होती है।पुलिस आज अपने संकल्प कर्तव्य शपथ रूपी आदत से सारे वीरान चौराहे , हर स्थान पथ पर सत्य निष्ठा से खड़ी रहती है।आज इसे देखकर इंसान अपनी कुछ आदतों में मन शब्द में बदलाव लाते हुए पुलिस की छवि,कार्य की सराहना कर रही है। पुलिस और जनता के बीच भावनात्मक जुड़ाव दिख रहा है।पुलिस का मानवीय एवं सवेंदन कार्य लोगों में चर्चा एवं आपनत्व को मज़बूत किया है।ए इसी तरह सदैव बना रहे।अगर इंसान के सफल जीवन की चाहत आदत में शामिल हो तो जीवन से लाख चाहने पर भी अच्छी आदत नहीं बदलता है।कुछ इंसान भीड़ में भी वह अपने निराले आदत के कारण पहचान बनाए रखते है, यही इंसान की आदत पहचान एवं विशेषता बन जाती है। यही उसका व्यक्तित्व है।प्रकृति का यह नियम है कि एक मनुष्य की आदत दूसरे से भिन्न होती है।प्राकृति का यह जन्मजात भेद भाव प्राकृति तक ही सीमित नहीं है।इंसान की कुछ आदतें स्वभाव, संस्कार और प्रवृत्तियों में भी दिखती रहती है।मनोविज्ञान ने यह पता लगाया है कि प्रत्येक इंसान कुछ आदतों के साथ जन्म लेता है।ये स्वाभाविक, जन्म-जात आदत ही मनुष्य की प्रथम पहचान होती हैं।इसके बाद उम्र के सफ़र में कुछ आदतें इंसान से जुड़ती रहती है।मनुष्य होने के नाते प्रत्येक मनुष्य को इन आदतों की परिधि में ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित रखना पड़ता है।इन आदतों का सच्चा रूप क्या है,ये इंसान के जीवन में कितनी प्रकार की होती हैं, इनका संतुलन इंसान स्वयं में किस तरह बैठता है, ये इंसान के जीवन का रहस्य है।एक बार किसी चीज़ का आदत लग लाने पर उसे छोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है।व्यवहार , संस्कार, आचरण जीवन में बोलती है।लाख छुपाये इंसान, लेकिन ए आदत इंसान के शख्सियत की निशाँ छोड़ती हैं।अतः अनजाने में हमें बुरा आदत ना लगे इसी लिए हर इंसान को सावधान और सतर्क रहना चाहिए।परन्तु जीवन में कुछ जाने, अनजाने में आदत जीवन से जुड़ जाता है तो उससे निकलना काफ़ी कठिन होता है।परंतु दृढ़ संकल्प के साथ कुछ आदतो में इंसान अच्छे ज़िंदगी के लिए बदलता है तो उसका जीवन काफ़ी सुंदर हो जाएगा।और अंत कहूँगा की:-खेल ताश के हो या ज़िन्दगी की अपनी आदत का इक्का तभी दिखाओ जब सामने वाला बादशाह हो।(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
वरिष्ठ पत्रकार अनूप नारायण सिंह की कलम से बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की संघर्ष गाथा
Rupesh Kumar 2020-04-23 14:21:51
पटना, 23 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। मृत्युंजय कुमार सिंह का जन्म आरा के खननी कला गांव में एक किसान परिवार में हुआ उनके पिता श्री रामाधार सिंह जी है उनकी माता स्वर्गीय विंध्यवासिनी देवी थी जिनका स्वर्गवास इन के बचपन में ही हो गया था।इनकी शिक्षा दीक्षा आरा में ही हुई। उन्होंने जैन कॉलेज आरा से इतिहास में एम.ए किया तत्पश्चात 1994 में पुलिस की नौकरी में आए।अपने बेहतर कार्य से नित्य नई ऊंचाइयों को छूते रहें उनकी पहली पोस्टिंग बिहार के नवादा जिले में हुई जहां इन्होंने तन मन से जनसेवा की और निरंतर आगे बढ़ते हुए समाज को अपने साथ लेकर चलते रहे नौकरी के दौरान पुलिस वालों को होने वाले कष्टों को देखकर इन का मन दुखी हो जाता था इतनी कठोर मेहनत के बाद भी ना कोई सुविधा नहीं खाना पीना हराम बस काम ही काम जब सब लोग अपने परिवार वालों के साथ होली दीवाली दशहरा मनाते है तब पुलिस वाले समाज सेवा में लगे रहते है इन सबके बावजूद इन को सुनने वाला कोई नहीं होता था। तभी एक दिन उनके मन में आया कि क्या इन लोगों की आवाज बनें और अपने सपनों को उन्होंने 2011 में बिहार पुलिस एसोसिएशन के इलेक्शन को जीतकर अमली जामा पहनाया अपने कुशल नेतृत्व में पुलिस वालों के साथ ही साथ आम जनता का भी मन जीत लिया दूसरी बार 10 जून 2015 को बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर भारी मतों से विजयी हुए।2019 के नवम्बर में तीसरी बार पुलिस एसोंसीएशन के अध्यक्ष भारी मतों से जीते ।कर्मियों की कई लाभकारी उद्देश्यों के प्रति भी उन्होंने सफलता हासिल की .इनके प्रयास से 13 माह का वेतन बिहार पुलिस एसोसिएशन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है. वे कहते है कि बिहार पुलिस काम के बोझ से दबी हुई हैं हर जगह पुलिस वाले को जेम्स बांड बनाकर भेज दिया जाता है जबकि यह समस्या से ग्रस्त हैं ऐसे में आम समस्या का समाधान हो तो कौन करेगा या कोई नहीं देखता आज बिहार के कई चर्चित कांडों की जांच उद्भेदन अच्छे से पुलिस ने की है और वर्तमान में कर रहे है.आम जनमानस को आज भी पुलिसकर्मियों पर काफी भरोसा है कई बड़े कुख्यात अपराधी आज जेल की सलाखों के अंदर है.कई को सजा भी हो चुकी है ।देश के सबसे अच्छी पुलिस बिहार की है आज बिहार में सुशासन की बात होती है बेहतर राज की बात होती है.यह सब बेहतर पुलिसिंग के कारण ही. बिहार पुलिस तूफान हो धूप हो या कराके की ठंड हो । विषम परिस्थिति में रहते हैं बिहार पुलिस के जवान बलिदान की पीछे नहीं हटते हमें गर्व है बिहार पुलिस पर यह कहना है बिहार पुलिस मेंस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह का श्री सिंह कहते हैं कि हमें गर्व है कि हम बिहार पुलिस के एक सच्चे सिपाही और जनता के सच्चे सेवक हैं आज पुलिस कर्मीयों के अपने परिवारिक समस्या है इनके बच्चों की पढ़ाई हो या बुढ़े मां बाप की सेवा हो रिश्तेदार मित्रों या परिवारिक शादी में शामिल नहीं हो पाते अपने बच्चे के शादी के लिए भी छुट्टी के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है जिससे पुलिसकर्मी मानसिक तनाव में आ जाते हैं पुलिस भी आम आदमी की तरह मनुष्य है और इसी समाज से आते हैं मूलभूत सुविधाओ जैसे रोटी कपड़ा और मकान पुलिसकर्मियों के पास अभाव में पुलिस की समस्याओं के समाधान के लिए काफी प्रयास की गई तथा समाधान हुआ है इसके लिए सरकार प्रयासरत है पुलिस कर्मियों में भी काफी बदलाव की जरूरत है आम जनता की बातों को अच्छे से सुने और उनका समाधान करें। राजनेता का परिवार को व आम जनता को एक नजर से देखें और उसका कार्य करें जिससे आम जनता का भरोसा बढ़ेगा. भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक मृत्युंजय कुमार सिंह पांच भाइयों के भरे पूरे परिवार में सबसे दुलरुआ थे वह कहते हैं कि बचपन में मां को खो देने का दर्द ने उनके जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी सामाजिक दायित्वों के लिए सदैव तत्पर रहने वाले मृत्युंजय अपने पांच भाइयों में दूसरे नंबर पर हैं वह कहते हैं कि मैंने कभी भी भीड़ का हिस्सा बनने की चाहत नहीं रखी सकारात्मक सोच के साथ एक अलग पहचान बनाई क्षत्रिय को वह जाति नही एक संस्कार मानते हैं उनका कहना है कि क्षत्रिय संस्कार है विचार है धर्म है कर्म है व कर्तव्य है. जन्म और कर्म से क्षत्रिय है मृत्युंजय .खाली समय में किताब पढ़ने के शौकीन है. चिंतन पठन पाठन सामाजिक कार्यों में इन्हे सुकून मिलता है छात्र जीवन से ही यह देश विदेश की नीति सामाजिक बदलाव के प्रति जागरुक रहे है .वे कहते है पुलिस से समाज को ढेर सारी अपेक्षाएं है उसी प्रकार पुलिस को भी समाज से अपेक्षा रहती है अगर आम आदमी ससमय सूचना सत्य निष्ठा के साथ पुलिस को उपलब्ध कराएं तो किसी भी घटना का उद्भेदन यथाशीघ्र किया जा सकता है .पटना में प्रतिवर्ष उनके द्वारा मनाए जाने वाले महाराणा प्रताप जयंती में सभी जाति के कर्मठ लोगों को सम्मानित किया जाता है यह एक परंपरा को जीवित रखने का प्रयास है. जिसमें जाति-पाति धर्म संप्रदाय से ऊपर उठकर समतामूलक समाज की स्थापना करने की ललक हैं. उनका कहना है व्यक्ति गलत हो सकता है पर कोई जाति या समाज गलत नहीं हो सकता वर्ष 2007 से 2010 तक मृत्युंजय कुमार सिंह एस टी एफ मे रहे इस दौरान कई बड़े नक्सलियों के खिलाफ अभियान में भाग लिया रिकॉर्ड 13 एनकाउंटर इन के खाते में दर्ज है ।नीतीश कुमार के दहेज विरोधी और शराबबंदी अभियान के बहुत पहले ही लगभग 8 वर्ष पहले इन्होंने विद्यापति भवन में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती में ही अपने समाज के लोगों से यह संकल्प दिलवाया था कि दहेज समाज के लिए कैंसर हम किसी व्यक्ति के साथ अगर संबंध जोड़ते हैं तो दहेज एक ऐसा रोग है जिस से उस संबंधी व्यक्ति की कमर टूट जाती है. शिक्षा के महत्व पर उनका कहना है कि ज्ञान शाश्वत है।क्षत्रिय महासभा बिहार के मुख्य संरक्षक और राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय कमेटी के सदस्य मृत्युंजय कुमार सिंह को इस बार राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है।कई समाजिक संगठनो से भी जुड़े है जिसमें इंटरनेशनल लायंस और रोटरी क्लब मुख्य है।राष्ट्रभक्ति और सनातन संस्कृति को जीवन में काफ़ी महत्व देते है ।भागवत गीता को जीवनशैली में ढाल कर समाज को उस पथ पर चलने को प्रेरित करते है।एक लेखक के रूप में उनका चेहरा सामने आया है । अपनी लेखनी को *फ़ुर्सत के पल में * नाम के साथ हर जीवन से जुड़े बिंदुओं को बहुत गहराई के साथ लिखते है ।जिसको वर्तमान समय में काफ़ी प्रशंसा मिल रही है ।महाराणा प्रताप और विवेकानंद के विचारों को अपना आदर्श बनाए है।आज के परिपेक्ष में उनका कहना है कि साधन के प्रयास से पुलिस का स्वरूप बदला है पहले से सुविधाएं बेहतर हुई है इन्हे बिहारी होने का गर्व है वह कहते हैं कि देश के इतिहास से बिहार के इतिहास को अलग नहीं किया जा सकता ऋषि मुनियों मनीषियों विद्वानों भगवान महावीर गौतम बुद्ध आर्यभट्ट चाणक्य जनक नंदिनी सीता गुरु गोविंद सिंह डॉ राजेंद्र प्रसाद रामधारी सिंह दिनकर बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे इतिहास पुरुषों की जननी रही है बिहार की धरती देश में कई क्रांतियों का सूत्रपात बिहार के इस पवित्र धरती से हुआ है आज पूरे देश ही नहीं विदेशों में भी बिहारी प्रतिभा का डंका बज रहा है.पटना मे अपने अथक प्रयास से इन्होने क्षत्रिय भवन की स्थापना करवायी है.
पत्रकारिता जैसे पवित्र कार्य के नाम पर समाज में शोषण करने वाले समाज विरोधी हैं-श्याम चन्द्र श्रीवास्तव
Root News of India 2020-04-20 21:58:10
सुलतानपुर, 20 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। देश में कोरोना संक्रमण की महामारी के बचाव हेतु लगे लॉक डाउन मैं सिर्फ पत्रकारों को अपना कार्य करने की आजादी है इसका फायदा दो नंबर के लोग माफिया टाइप के लोग फर्जी पत्रकार बन के उठा रहे हैं यह बात शासन और प्रशासन के संज्ञान में भी अब आ गई है तभी तो देश के सूचना प्रसारण मंत्री ने ऐलान कर दिया है कि फर्जी पत्रकारों पर कार्यवाही हो यूट्यूब और व्हाट्सएप ग्रुप चलाने वाले भी पत्रकारों की तरह आईडी बनवा करके और जेब में कंप्यूटर का कार्ड पत्रकारिता का बना करके घूम रहे हैं यही नहीं वह ब्लैकमेलिंग भी व्यापारी को कर रहे हैं ऐसी शिकायतें निरंतर सीनियर पत्रकारों को और प्रशासन को मिल रही है अब प्रशासन इस दिशा में गंभीर कदम उठाने जा रहा है बहुत जल्दी ऐसे फर्जी पत्रकार पकड़े जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में आप सब प्रशासन का सहयोग करें जो भी आपको पत्रकार बता कर के सुविधा शुल्क की मांग करें तुरंत उसकी सूचना स्थानीय पुलिस प्रशासन को या सूचना कार्यालय को दें जिससे ऐसे लोगों पर कार्यवाही की जा सके कोरोना संक्रमण के दौर में ब्रजभूमि कम से कम 1000 फर्जी पत्रकार बनकर घूम रहे हैं जो निश्चित कहीं न कहीं ब्लैक मेलिंग कर रहे हैं या गलत काम में संलिप्त है सोनू ने मैं तो यहां तक आया है कि वह दारू की सप्लाई मोटी रकम में कर रही है और गुटका की सप्लाई का ठेका इन्होंने ले रखा है ऐसे लोगों पर कठोर कार्यवाही हो यह सभी पत्रकार मांग करते हैं।
बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से 'भविष्य के गर्भ में जन्म लेता नया विश्व'
Rupesh Kumar 2020-04-19 19:20:28
पटना, 19 अप्रैल 2020, (आरएनआई)। आज की वर्तमान गम्भीर समस्या पूरे विश्व को किस मार्ग पर चलने को प्रेरित करेंगी भविष्य के गर्भ में एक जटिल प्रश्न के रूप में जन्म लेगा।इसका उतर अभी बताना जल्दबाज़ी होगा।कोरोंना से लड़ रहे युद्ध में उलझी दुनिया दुनिया काफ़ी चिंतित है।कोरोंना महामारी पूरे विश्व को अंधकार में धकेल रही है।हर सरकार परेशान हो गई है।वर्तमान में जटिलता भविष्य के कई प्रश्नों को जन्म दे रही है।कोरोना एक महामारी या तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत है , इसे समझने के लिए हमें कुछ बातों पर गौर करने की जरूरत है।क्योंकि जैसे जैसे समय बितता जा रहा है इसकी ख़ुशबू कई देशों में तनाव पैदा कर रही है।कई देश चीन से व्यापार करने पर पुनः समीक्षा के मूड में आ गए है।भाइयों कोरोना एक वेशविक महामारी बनकर पूरे विश्व में छा गयी जिसका फैलना या फैलाना ऐसा मुद्दा बन चुका है जिसे अमरीका ने यूं एन में उठाया। लेकिन चीन की वीटो के कारण उस मुद्दे पर बहस को टाल दिया गया। जिससे पहली बार यूरोप को मालूम हुआ वीटो के गलत इस्तेमाल होने का मतलब क्या होता है।आज उन्हें लगने लगा है कि यह वीटो पावर का खेल यूं एन में नहीं होना चाहिए।भारत देश की समस्या को आज तक अमरीका और यूरोप ने समझने की कोशिश नहीं की थी।भारत के कई प्रस्ताव पर चीन द्वारा वीटो लगाया गया है।पहली बार अमेरिका, यूरोपियन देशों को लगा है कि अपने फायदे के लिए गलत लोगों का साथ देना आस्तीन में सांप पालने जैसा है।अब उसे खत्म करना बिल्कुल युद्ध लड़ने जैसा है।आज तीसरे विश्वयुद्ध की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है।किसी भी युद्ध के पहले पटकथा तैयार होती है। जैसा कि प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तैयार हूवा था ।कोरोंना पर हम नजर डालें तो चीन ने इस बीमारी की ऐसी पिक्चर विश्व में फैलायी जिससे लग रहा मानव अंत की शुरुआत हो गयी हो।परंतु विश्व के डॉक्टर, वैज्ञानिक कोरोंना की दवाई पर सोध प्रारम्भ कर दिए है । और जल्द इसका दवाई बना लेंगे।आज के वर्तमान समय में चीन एक पैनिक माहौल बनाने में वो कामयाब रहा।विश्व को भ्रमित करने के लिए उसने अपना शेयर मार्केट गिरा दिया जिससे पूरे विश्व में हड़कंप मच गया जो वो चाहता था वो किया।और यूरोपियन इन्वेस्टर ने अपने शेयर मार्केट में बेचने शुरू कर दिए और शेयर वेल्यू इतनी नीचे चलीं गईं जिसकी अमरीकन और यूरोपियन इन्वेस्टर ने सोचा भी नहीं था।वो चीन के महामारी के नाम पर फैलाये गये चक्रव्यूह में वो ऐसे फंसे की पूरा यूरोप, जर्मन, जापानी, और अमरीका के इंवेस्टर अपने शेयर कौड़ियों के भाव बेचकर सड़क पर आ गये और उन्हीं शेयर को देश की आर्थिक बर्बादी का डर दिखाकर चीनी सरकार ने पैकेज लाकर खरीद डालें और एक ही झटके में अपने देश की विदेशी कम्पनियों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर डाला।इसको जब तक अमरीका और यूरोप ने समझा तबतक उनकी अर्थव्यवस्था जड़ से चरमरा गई।आज अमेरिका सबसे ज्यादा मेहनत कर चीन के दोहरे चरित्र के चाल को विश्व के सामने लाने का प्रयास कर रहा है।अमेरिका जानता हैं कि चीन ने उसे कहा से कहा पहुंचा दिया है।चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन के गठजोड़ का नतीजा है जो विश्व को महामारी से पूरे विश्व को आर्थिक रूप से कमज़ोर करने की ओर ले गया।मेरे मित्रों अगर आप चाहते हैं कि हमारा देश वर्तमान समय में कोरोंना बीमारी और विश्व आर्थिक षड्यंत्र से बाहर निकले तो इसमें सभी भारतीय को स्वच्छ मन चित से सोच कर राष्ट्र के प्रति प्रेम समर्पण और सरकार के निर्दोषों को पालम करने का संकल्प लेना होगा।सरकार राष्ट्रहित और जनता हित में लघु , कुटीर और घरेलू उधोग का बढ़ावा दे और आर्थिक सहयोग करे।राष्ट्र पर संकट आने पर हम हर बार लड़कर विजेता बने है।आज हमसभी देश में भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की कसम खाए और कही भी दृष्टिगोचर भ्रष्ट व्यवस्था से नफ़रत करनी शुरू करे। सरकारी सिस्टम ही नहीं देश के हर सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सहयोग के साथ वचनबद्ध बने ।हमसभी अपने बच्चों को जन्म से राष्ट्रभक्ति , प्रेम भाईचारा , मेहनत करना सिखाये।उन्हें समझाए की कोई भी सफलता उन्हें अपनी योग्यता से मिलनी चाहिए।वो सफलता रिश्वतखोरी को बढ़ावा देकर ना मिले और ना ही किसी का हक मार कर प्राप्त हो। देश को वर्तमान एवं आने वाले समय में ईमानदार राजनेता , निष्पक्ष और मेहनतकश पुलिस, डाक्टर, इंजीनियर, वेज्ञानिक सहित हर क्षेत्र में सुंदर वक्तित्तव पैदा हों जो अपनी मेहनत के बल पर वेक्सीन, दवाइयां, इंसान के उपयोग से जुड़े हर वस्तु और उपकरणों की खोज करे, न्याय के साथ क़ानून का राज हो जिससे देश में ख़ुशहाली हो और देश अपने बलबूते पर समस्याओं का सामना कर पाये।मेरे दोस्तों ये लोकडाउन हमें बहुत कुछ सिखाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।हमें आज अपने आपको और अपने बच्चों को सबसे पहले भारतीय बनाने की शुरुआत करनी होगी, हमेशा अपनी रगो में अनेकता में एकता प्रेम का लहू दौड़ाना होगा।हम कितने भी बड़े अधिकारी बिजनेस मैन, नेता क्यों ना हों, अपने कार्यालय में आए हर व्यक्ति का अपनी सीट से अच्छे शब्दों से अभिनन्दन करें और उसका काम कर ईमानदार व्यवस्था कायम करें.कोरोंना वायरस लैब मैं बनाया गया बाइलोजिकल हथियार हो या जन्तु से मानव में फैलने वाला वायरस, या आर्थिक वायरस हो, इस गंदी वायरस की शुरुआत विश्व के मानव सभ्यता में हो चुकी है। जिसका सामना हम सभी को हर क्षेत्र में मज़बूती से करना है।आए हम सभी समय से क़दम से क़दम मिलाकर हम एक नया सभ्य समाज बनाना। मुझे यकीन है हम ये कर सकते हैं।भारत संस्कृति और इतिहास प्रमाणिकता के रूप में दृष्टिगोचर है कि हर संकट से भारतीय अपने दृढ़ संकल्प के साथ हर काल खंड में विजय पताका लहराएँ है।अंत में कहूँगा :- जो दर्द का विषपान किया हो, उसी की हंसी निष्पाप होती है।

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