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नारी क्या बनना चाहती है – पूज्या या भोग्या?

Root News of India 2018-11-26 18:51:04    EDITORSPICK 4063
अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी ।

ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत !! ( ऋग्वेद )

ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है “मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं ! ”

भारतीय मनीषियों ने सदैव से ही स्त्री-पुरुष को न केवल एक दूसरे का पूरक माना अपितु मनु स्मृति में स्त्री को पूजनीय कहकर समाज में प्रतिष्ठित किया गया !

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: !

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!

जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है.

जहां महिलाऑ काअपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं I

विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कह सकते है तभी तो पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित हो रहा है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और वेद माता गायत्री है ! नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्स! न त्यजन्ति गृहं हितत्।।

जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।

भारत में हमेशा से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया । भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ? किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए हम सत्यनारायण भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है ! नारी के प्रति किसी भी प्रकार के असम्मान को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है चाहे नारी शत्रु पक्ष की ही क्यों ना हो तो भी उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा भारत में है।

तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा भी है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-

अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।

इन्हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।

(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पाप नहीं है।)

भारत की यह परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को, विवाह के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को “ध्रुवतारे” जैसा स्थान प्राप्त हो गया। “इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती।

व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे? वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि भारतीय नारी ने कभी भी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग नहीं किया नहीं तो आर्य-वर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का ख़त्म हो गया होता।

परन्तु वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में भी नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का और इक्कीसवी सदी का यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण का काल है। आजकल मनुष्य जाति के इतिहास में ‘वस्त्र सभ्यता’ ने बड़ी धूम मचा रखा है !

बाजारवाद का यह मूल मन्त्र है कि “जो दिखता है वो बिकता है !” शायद इसलिए नारी को को लगभग हर विज्ञापन से जोड़ दिया जाता चाहे वो विज्ञापन सीमेंट का हो, चाकलेट का हो, अन्तः वस्त्र का हो, अथवा किसी मोबाईल के काल रेट का जो दो पैसे में दो लड़कियां पटाने की बात करता है ! और तो और विज्ञापन – क्षेत्र में करियर चमकाने की स्त्री की लालसा को आज का बाजार लगभग उसी पुरा पाषण-काल के दौर में ले जाने को आतुर है जहाँ लोगों को कपडे का अर्थ तक नहीं पता था पहनने की बात तो दूर की है ! यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आजकल की स्त्री वही कपड़े पहनती है जो बाजार चाहता है !

सेक्स और बाजार के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों अर्थात “एडवरटाइजमेंट” पर ही निर्भर है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है।

आजकल कलंक की भी मार्केटिंग होती है क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से नारी को रिझा रहा है और बोली लगा रहा है।

प्रसिद्द नारीवादी विचारक एवं लेखिका सिमोन द बोवुआर का एक प्रसिध्द वाक्य है- ‘स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है।’

पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह कोई पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद का विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है। हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है।

औरत की देह इस समय दूरदर्शन के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है।

केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है। भोग और कामोपभोग से तृप्ति उसे कभी नहीं मिलती है ! यौनिक स्वतंत्रता का मूल्य क्या है, यह केवल स्वच्छंदता और नासमझी भरी छलांग हो सकती है, अस्तित्व का खतरे में पड़ना जिसका परिणाम होता है। इसी तरह यौन शुचिता या कौमार्य का प्रश्न भी है। यह केवल स्त्रियों के लिए नहीं होना चाहिए। यह जरूरी है कि पारस्पारिक समर्पण एवं निष्ठा से चलने वाले वैवाहिक या प्रतिबध्द जीवन के लिए दोनो ओर से संयम का पालन हो। और इसकी समझ स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से अनिवार्य एवं आवश्यक हो। पुरुष को भी संयम एवं संतुलन के लिए प्रेरित करने में स्त्री की भूमिका सदा से रही है। इसलिए स्त्री संयम की अधिष्ठात्री है। उसे स्वाभाविक संयम एवं काम प्रतिरोध की क्षमता प्राकृतिक रूप से भी उपलब्ध है।

यौन शुचिता जीवन के रक्षण का ही पर्याय है और यौन अशुचिता नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से भी हमें विनष्ट करती है। संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है। कहावत भी है- ‘सब्र का फल मीठा होता है।’ इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो भागता है सुगंध के लिए परन्तु अतृप्त हो कर थक जाता है । सुगंध स्वयं उसके भीतर है। उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है। देह तो एक चारदीवारी है, एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है ।

वर्तमान दौर में नारी को उसे आधुनिक समाज ने स्थान अवश्य दिया है पर वह दिया है लालसाओं की प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं। एक लेखक ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूंजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।

पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ‘ कामायनी ‘ का रचनाकार ” नारी तुम केवल श्रृद्धा हो” से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-” स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ ” उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋग्वेद ) !

इतिहास में मैंने पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी. तब महिलाओं की तूती बोलती थी. फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले ! मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी ! आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सब कुछ नहीं होने लगा है. उदहारण के लिए आर्टिकल 498 – A को भला आज कौन नहीं जानता ? भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जा सकता है ! लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता. लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा. कभी हम मरेंगें, कभी तुम मरोगे !

समय करवट ले रहा है ! विचारक ‘जोड’ ने एक पुस्तक में लिखा है- ”जब मैं जन्मा था तब पश्चिम में होम्स थे, अब हाउसेस रह गए हैं क्योंकि पश्चिमी घरों से स्त्री खो गई है।” कही यह दुर्गति भारत की भी ना हो जाय क्योंकि भारत में यदि भारतीय संस्कृति यहाँ का धर्म और विचार अगर बचा है तो नारी की बदौलत ही बचा है ! अतः नारी को इस पर विचार करना चाहिए !

अब स्त्री को खुद को सोचना है कि वह कैसे स्थापति होना चाहती है पूज्या बनकर या भोग्या बनकर !

वैभव विशाल



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नई दिल्ली, 19 दिसंबर (आरएनआई)। अभी चर्चाएं शुरू नहीं हुई हैं। बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। मीडिया को मुट्ठी में लेने वाली सियासी ताकतों की तरह अब अंबानी ग्रुप ने देश की हलचलों को अपनी मुट्ठी में ले लिया है। हुकूमत के बचाव की सियासत में इंटरनेट की दुनिया में वन टू का फोर करने वाली ताकतें फोर टू का वन करने लगी हैं। मेरा ये शक आपके यकीन में बदल सकता है। इसके लिए पूरा माजरा समझये-
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योगी के रामराज्य मे भी महिला अस्मिता सुरक्षित नही
Root News of India 2018-11-18 07:24:00
लखनऊ, 18 नवंबर (आरएनआई)। भारत जैसा विशाल राष्ट्र जहाँ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता जैसी सस्कृति पुष्पित पल्लवित होती रही है।इसी की दम पर भारत विश्व के क्षितिज पर विश्व गुरु बना रहा है।लेकिन हम जैसे ही भाषिक द्रष्टि से बडबोलेपन का शिकार होकर पाश्चात्य सभ्यता की ओर उन्मुख हुये वैसे ही महिला अस्मिता तार तार होने लगी। भारत के उत्थान मे महिलाओं के योगदान को नकारा नही जा सकता। उत्पादन के क्षेत्र मे,युद्ध के क्षेत्र मे ,सामाजिकता के क्षेत्र मे महिलाओं की महती भूमिका रही है। इतिहास गवाह है कि महिलाओं की वजह से ही भारत का गर्वोगत भाल विश्व क्षितिज पर चन्द्रमा की भातिं चमकता रहा है। भारत मे पाश्चात्य सभ्यता अपनाने की होड ने महिलाओं को पीछे की पंक्ति मे ढकेल दिया।और अपने  को  सभ्य और सुंंसस्क्रत मानने लगे।भारत मे आज महिलाओं की बडी ही दीन दशा दिखाई पड रही है। आये दिन छेडछाड, यौन उत्पीड़न के सैकडो केस सामने आ रहे है। सरकार केवल बयान वाजी कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर ले रही है।देश मे जब कोई बडी घटना होती है तो बडे बडे तिजारती ऊचे ऊचे मंचो से घडियाली आसूं बहाते दिखाई देते है।कैडिल मार्च का आवाहन कर भोली भाली जनता को गुमराह कर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकने से बाज नही आते। ऐसे मे यह प्रश्न ऊठना लाजिमी है कि आखिर इन घटनाओं पर रोक क्यो नही लगती। या तो सरकार ऐसी घटनाओं को रोकना नही चाहती या अपराधियों के दबाव मे रोक नही पा रही है। भारत मे खादीधारी महिलाओं के प्रति कितना सवेदनहीन है इसकी बानगी गत बर्ष पेश करते हुये समाजवादी पार्टी के मुखिया व पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिह यादव ने कहा था कि लडको से गलतियां हो ही जाती है। जिसकी चहुँ ओर निन्दा हुई थी। बर्तमान मे उप्र मे भाजपा सरकार मे योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री है जिन्होंने ने महिलाओं की अस्मिता के रक्षार्थ एन्टी रोमियो स्क्वायड बना डाली लेकिन यह टीम भी महिलाओं को सुरक्षा न दे सकी।प्रदेश के किसी स्कूल ,कालेज,बाजार, रेलवेस्टेशन, बस अड्डा पर देख लीजिए महिलाओं की अस्मिता पर सकट के बादल छाये नजर आयेगे।इसी सरकार मे उन्नाव, मुजफ्फरनगर ,जैसे काण्ड हो गये।देवरिया सुधार ग्रह मे यौन उत्पीड़न का सबसे लेटेस्ट उदाहरण है। सरकार केवल बयान देकर अपना पल्ला झाड लेती है। ऐसे मे देश के प्रसिद्ध कवि रहे मैथलीशरण गुप्त की पक्तियां "अबला तेरे जीवन की है यही कहानी ।आंचल मे है दूध और आंंखो मे पानी"आज भी कितना प्रासंगिक है।
मौलाना अबुल कलाम आजाद : भारतीय राजनीति एवं नव भारत निर्माण का महान व्यक्तित्व
Anand Mohan Pandey 2018-11-10 13:01:26
शाहजहांपुर, 10 नवंबर (आरएनआई)। मानवता और राष्ट्रीयता के आकाश में स्थित् दैदीप्यमान नक्षत्रों में मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम अमर है वह कुशल राजनीतिज्ञ शिक्षाविद पत्रकार एवं राष्ट्रीय समरसता के पक्षधर तथा राष्ट्र को समर्पित नेता थे उनका जन्म 11 नवंबर 1888 को पवित्र नगर मक्का में हुआ था इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही तथा परंपरागत परिवेश में हुई थी इनके पिता मौलाना खैरूद्दीन अरबी भाषा के विद्वान थे यह प्रारंभ से ही प्रखर बुद्धि के थे तथा भाषा एवं मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने वाले थे आगे चलकर इनका झुकाव वैज्ञानिक शिक्षा की ओर होता गया जहां तक भाषाओं का ताल्लुक है मौलाना साहब अरबी फारसी हिंदी उर्दू अंग्रेजी तथा बंगला आदि भाषाओं के विद्वान थे वर्ष 1890 में मौलाना साहब का परिवार भारत आकर कोलकाता में रहने लगा कुछ समय बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गए तथा 1905 में बंगाल विभाजन का विरोध किया उन्होंने मात्र 12 वर्ष की उम्र में प्रथम पत्रिका नेरंग आलम का संपादन किया इसके बाद तो संपादन और पत्रकारिता का सिलसिला आगे बढ़ता ही गया वर्ष 1912 में मौलाना साहब ने उर्दू का साप्ताहिक समाचार पत्र अल हिलाल का प्रकाशन और संपादन किया जिसका मिशन था राष्ट्रीय एकता और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जागृत करना तथा मार्गदर्शन करना मौलाना साहब महात्मा गांधी के आंदोलन में सक्रिय भागीदार रहे इसके लिए उन्हें अंग्रेजों का कोप भाजन भी बनना पड़ा और जेल की सजा भुगतनी पड़ी जहां तक राजनीतिक दल का प्रश्न है वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे तथा कांग्रेस के दो बार प्रेसिडेंट भी बने अब्दुल कलाम साहब सबसे कम उम्र के कांग्रेस प्रेसिडेंट रहे भारत की स्वतंत्रता के पश्चात उन्हें नेहरू जी के मंत्रिमंडल में भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री बनाया गया और वह 10 वर्षों तक शिक्षा मंत्री रहे वे सदैव एकता और राष्ट्र कल्याण को प्राथमिकता देते थे कलाम साहब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नवीन एवं सर्व शिक्षा व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयत्न करते थे और उसे अपना लक्ष्य मानते थे यूजीसी आईआईटी तथा ललित कला एकेडमी की स्थापना उन्हीं के प्रयत्नों का परिणाम है वह शिक्षा सशक्त संपन्न और एकता के सूत्र में बंधा भारत देखना चाहते थे 22 फरवरी 1958 को काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया और वे विराट कायनाथ का हिस्सा बनकर आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं
पत्रकारिता का बाजारीकरण होने से समाचार पत्र विज्ञापन पत्र बन गए हैं, पत्रकारिता कब पक्षकारिता में तब्दील
Root News of India 2018-11-09 23:02:20
आज के दौर में सच उस वैश्या जैसा है जिसे पसंद तो सब करते हैं लेकिन कोई वैश्या को अपनी अर्धांगिनी बनाना नही चाहता ठीक उसी तरह सच सबको पसंद होता है लेकिन सुनना कोई नही चाहता? इस दौर में सच परमाणु बम जैसा हथियार बन गया है जिसके प्रहार से घायल होने वाला पगला जाता है और अजीब अजीब हरकतें करने लगता है। जैसे उसे 440 वोल्टेज का करंट लग गया हो? वाकई सच में बहुत पॉवर होती है।
आओ अंतर्मन के दीप जलाए
Anand Mohan Pandey 2018-11-05 18:29:08
शाहजहांपुर, 5 नवंबर (आरएनआई)। दीपोत्सव अंधेरे से उजाले की ओर यात्रा का एक पावन पर्व है जिसे संपूर्ण देश में तथा विदेशों में भी विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है यह हमारी ज्योतिर्मयी संस्कृति का प्रतीक है इस पर्व में हम जहां बाहरी अंधेरे को भांति भांति प्रकार से दूर करने का प्रयास करते हैं तमाम भौतिक पदार्थों की रंगाई पुताई और साज-सज्जा करते हैं यही साज सज्जा और दीपमालाओं का प्रकाश हम अपने मन में भी जगमगाए तो बाहर अंधेरा ही नहीं रह जाएगा आज जीवन के तमाम मुद्दों पर जिस अंधेरे का हम सामना कर रहे हैं उसका कारण अपने मन को प्रकाशित नही करना है इस अकल्पनीय विस्तृत ब्रह्मांड और समय के अति सूक्ष्म खंड में हमारा अल्प समय के लिए अस्तित्व है फिर भी हम विसंगतियों और अंधेरे के दास बने हुए हैं एक असंवेदनशील कण की तरह इधर-उधर टकरा रहे हैं यह पवित्र पर्व इसी बात का संकेत देता है कि हमें अपने अंदर के अंधकार को दूर करना है ताकि हमारी दिशाहीनता समाप्त हो सके जिससे पूरे विश्व में फैल रही वैमनस्यता विसंगतियां तथा चल रही आड़ी तिरछी लकीरों को समाप्त किया जा सके साथ ही ऐसा आयाम स्थापित किया जा सके जहां संपूर्ण जीवन और मूल्यों का दर्शन हो सके यही नहीं इस अखिल ब्रह्मांड का रचेता भी बार-बार उस आयाम में आने को उतावला रहे किंतु इसके लिए आवश्यकता है अपने अंतर्मन में चेतना रूपी एक दीप जलाने की जिसके प्रकाश से अंदर और बाहर सभी कुछ जगमगा उठेगा पर धनवर्षा तो क्या सुख समृद्धि आदि सभी से यह विश्व पूर्ण रहेगा
दीपों का त्योहार: दीपावली
Rama Shanker Prasad 2018-11-03 09:27:21
पटना, 3 नवंबर (आरएनआई)। भारत के त्योहार यहाँ की संस्कृति और समाज का आइना हैं । सभी त्योहारों की अपनी परंपरा व अपना महत्व है । भारत को त्योहारों का देश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि यहाँ हर माह कोई न कोई त्योहार आते ही रहते हैं।दीपावली हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है । यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है । यह शरद ऋतु के आगमन का समय है जब संपूर्ण वातावरण सुहावना एवं सुंगधित वायु से परिपूरित होता है। दीपावली त्योहार के संदर्भ में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं । अधिकांश लोग अयोध्यापति राजा राम के दुराचारी श्रीलंका के राजा रावण पर विजय के पश्चात् अयोध्या लौटने की खुशी में इस त्योहार को मनाते हैं । उनका मानना है कि कार्तिक मास की अमावस्या की इसी तिथि को अयोध्यावासियों ने पूरी अयोध्या नगरी में भगवान राम के स्वागत के उपलक्ष्य में दीप प्रज्वलित किए थे, तभी से उसी श्रद्‌धा और उल्लास के साथ लोग इस पर्व को मनाते चले आ रहे हैं । वैश्य एवं व्यापारी लोग इस दिन आगामी फसल की खरीद तथा व्यापार की समृद्‌धि हेतु अपने तराजू, बाट, व बही-खाते तैयार करते हैं तथा ऐश्वर्य की प्रतीक देवी ‘लक्ष्मी’ की श्रद्‌धापूर्वक पूजा करते हैं । इसी प्रकार बंगाली एवं दक्षिण प्रदेशीय लोगों की इस त्योहार के संदर्भ में मान्यताएँ भिन्न हैं। यह त्योहार हिंदुओं के लिए विशेष महत्व रखता है । त्योहार के लगभग एक सप्ताह पूर्व ही इसके लिए तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं । इसमें सभी लोग अपने घरों, दुकानों की साफ-सफाई व रंग-रोगन आदि करते हैं । इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों व साज-सज्जा के द्‌वारा घर को सजाते हैं । इस प्रकार वातावरण में हर ओर स्वच्छता एवं नवीनता आ जाती है ।दीपावली मूलत: अनेक त्योहारों का सम्मिश्रण है । दीपावली धनतेरस, चौदस, प्रमुख दीपावली, अन्नकूट तथा भैया-दूज का सम्मिलित रूप है । धनतेरस के दिन लोग भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं तथा सभी इस दिन नए बरतनों की खरीदारी को शुभ मानते हैं। चौदस के दिन बच्चों को उबटन द्‌वारा विशेष रूप से स्नान कराया जाता है । इसके बाद दीपावली का प्रमुख दिन आता है । अन्नकूट में गोबर को रखकर गोवर्धन पूजा को प्रारंभ करवाया जाता है । भैया दूज के दिन सभी बहनें भाइयों को टीका लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। दीपवली का त्योहार खुशियों का त्योहार है । इस दिन सड़कों, दुकानों, गलियारों सभी ओर चहल-पहल व उल्लास का वातावरण दिखाई देता है । सजी-धजी दुकानों पर रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए लोग बड़े ही मनोहारी लगते हैं । व्यापारीगण विशेष रूप से उत्साहित दिखाई देते हैं । सायंकाल सभी घरों में लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। इसके पश्चात् सभी घर एक-एक कर दीपों से प्रज्वलित हो उठते हैं । इसके बाद सारा वातावरण पटाखों की गूँज से भर जाता है । बच्चे, बूढ़े, जवान सभी प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ते हैं । घरों, दुकानों आदि में दीप प्रज्वलित करने के पीछे मनुष्य की अवधारणा यह है कि प्रकाशयुक्त घरों में लक्ष्मी निवास करने आती है । प्राचीन काल में तो लोग इस रात्रि को अपने दरवाजे खुले रखते थे। दीपावली के त्योहार का मनुष्य जीवन में विशेष महत्व है । लोग त्योहार के उपलक्ष्य में अपने घर की पूरी तरह सफाई करते हैं जिससे कीड़े-मकोड़ों व अन्य रोगों की संभावना कम होती है । महीनों की थकान भरी दिनचर्या से अलग लोगों में उत्साह, उल्लास व नवीनता का संचार होता है। परंतु इस त्योहार की दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यह है कि लक्ष्मी के आगमन के बहाने लोग जुए जैसी राक्षसी प्रवृत्ति को अपनाते हैं जिसमें कभी-कभी परिवार के परिवार बर्बाद हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त दिखावे के चलते लोग इन त्योहारों पर जरूरत से ज्यादा खर्च करते हैं जो भविष्य में अनेक परेशानियों का कारण बनता है। अधिक धुआँ छोड़ने वाले तथा भयंकर शोर करने वाले पटाखों को छोड़कर खुश होने की घातक परंपरा को भी अब विराम देने की आवश्यकता है । हम सबका यह नैतिक कर्तव्य है कि हम इन कुरीतियों से स्वयं को दूर रखें ताकि इस महान पर्व की गरिमा युग-युगांतर तक बनी रहे ।
हम पत्रकारों को बहुत कुछ सीखना है।
Anand Mohan Pandey 2018-10-08 15:07:35
शाहजहॉपुर, 8 अक्टूबर (आरएनआई)। पत्रकार लोकतत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है किन्तु यह चौथा स्तंम्भ बहुत कमजोर और जर्जर हो गया है। आय दिन पत्रकारों को हमले और उन्हें बेवजह थानों में बुलाया जाता है, मैने डाक्टरों और वकीलों में एक बहुत अच्छी चीज देखी है अगर किसी के ऊपर कोई परेशानी आती है तो सभी एक होकर हड़ताल पर चले जाते है, ये क्षेत्रीय सहित देशव्यापी हड़ताल भी हो सकती है और होती है उक्त विचार जनपद के वरिष्ठ पत्रकार एवं उपज के प्रदेश सचिव राकेश श्रीवास्तव ने दिये इस एकता के कारण ही शासन और सरकार मामले का तुरन्त सम्जानक हल निकाल लेते है वही दूसरी ओर पत्रकारों में एकता जैसे व्यवस्था का अच्छा खासा अभाव देखने को मिलता है तथा मीडिया पर अनावश्यक स्टेटमेन्ट एवं खबरें डालकर कम होता है तथा भिन्नता का लोग लाभ उठाते है।
वरिष्ठ जन और समाज
Anand Mohan Pandey 2018-10-02 10:36:29
शाहजहांपुर, 2 अक्टूबर (आरएनआई)। सीनियर सिटीजन या कहिए वरिष्ठ जन को समाज और सरकार की ओर से सम्मान मिलना हमारी संस्कृति का अभिन्न भाग है कदम कदम पर हमें उसकी सहायता और सम्मान के लिए तत्पर रहना चाहिए साथ ही वरिष्ठ से समाज की अपेक्षा रहती है कि वह अपने अनुभवों को नई पीढ़ी में बैठे वह नई पीढ़ी को सही दिशा निर्देश दें ताकि समाज और देश ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में किसी भी प्रकार की विसंगति या विकृति समाज में जन्म ना ले सके यह आरोप कि आज के बच्चे या नई पीढ़ी कुछ सीखना ही नहीं चाहती पूर्णतया गलत है क्योंकि अतीत में जब हम सक्षम थे आज की युवा पीढ़ी तरुण थी तब हमारा ध्यान कहीं और था ऐसा नहीं है कि आज वरिष्ठ नागरिक समाज देश और विश्व को कुछ प्रदान नहीं कर रहे हैं किंतु इस क्रम में अभी संस्कृति का रूप नहीं आया है इसका सबसे बड़ा कारण अतीत का अहम नामक रोग है जो पंचतत्व के इस शरीर में गहरे जा बैठा है जब तक हम सरल होने की आदत नहीं डालेंगे तब तक हम नामक रोग हमें कष्ट पहुंचाता ही रहेगा सरलता का तात्पर्य वाणी व्यवहार और धैर्य की सरलता से है समाज देश और इस विश्व में एकता बंधुत्व और अहिंसा की स्थापना तभी आगे बढ़ सकती है जब वरिष्ठ जन और अतीत के अनुभवों से ओतप्रोत समाज को दिशा दें वरिष्ठ होने का अर्थ यह नहीं है कि हमने अपने सभी कार्यों की इतिश्री कर ली बल्कि जीवन के इस मोड़ पर आकर युवाशक्ति भावना से ओतप्रोत होकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करना है संस्कृतियों को एकाकार करना है ताकि वैमनस्यता और मानवता का दंश हमें कभी न लग सके यह सनातन है और रहेगी हमारा आवागमन बना रहेगा तो क्यों अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में आए इन अच्छी परिस्थितियों की स्थापना और संचालन के लिए अनुभव और वास्तविकता के ज्ञान की आवश्यकता होती है जो वरिष्ठओं के पास होते हैं भले ही वह इन्हें पहचाने और किसी भी रूप में समाज को दें अथवा विमुख रहे
इस अपरिमेय सृष्टि के विज्ञानमय स्वरूप का अनुभव करें
Anand Mohan Pandey 2018-09-26 14:25:45
शाहजहांपुर, 26 सितम्बर (आरएनआई)। हमारा दृश्यमय ब्रह्मांड और अनगिनत अदृश्य ब्रह्मांड जो पूर्व में अस्तित्व में रह चुके हैं या भविष्य में अस्तित्व में आने वाले हैं विज्ञानमय हैं अर्थात समस्त दृश्य और अदृश्य सृष्टि पूर्ण रूप से विज्ञानमय है और विज्ञान के नियमों का पालन करती है जिसे हम प्रकृति कहते हैं वह भी विज्ञान के नियमों का पालन करती है किंतु प्रकृति ने विज्ञान को निरपेक्ष (absolute) नहीं रखा है हां नियमो के विपरीत जाने पर हमें कष्ट का अनुभव होता है यहां तक की भावनाओं का उदय होना उनका अनुभव होना आदि सभी कुछ विज्ञान आधारित हैं वास्तव में मृत्यु पदार्थ और ऊर्जा (आत्मा) के संरक्षण का प्रकृति द्वारा दिया गया उदाहरण है सृष्टि रचना कार ने मनुष्य के हाथों में विज्ञान नामक कामधेनु सौंप दी है इसका सम्मान और सदुपयोग करने से हमें दिया गया जीवन काल स्वर्णकाल के समान व्यतीत होगा इस विश्व के अन्य विषय भी विज्ञान के ज्ञान के प्रभाव के अनुरूप ही विकसित होते हैं दुनिया में जिन्हें हम आश्चर्य के विषय मान रहे हैं वे भी विज्ञान की ही देन है यह दूसरी बात है कि हम उसे स्तर के विज्ञान को समझ नहीं पा रहे हैं और यदि इन आश्चर्य के संरक्षण की बात करें तो वह भी विज्ञान के सहारे ही संभव है मनुष्य ने जब विज्ञान के नियमों के पालन करने में असावधानी बरती है तब तब उसे विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है और पड़ रहा है हमारा ज्ञान क्योंकि विज्ञान के बारे में बहुत थोड़ा है इसलिए हम बहुत कुछ भ्रमित रहते हैं प्रकृति के वरदान और आशीर्वाद भी हमें विज्ञान के रूप में ही मिलते हैं आदिकाल से लेकर वर्तमान तक या भविष्य में जो भी है जो कुछ भी हो रहा है या होगा उसमें विज्ञान की सहमति या असहमति छुपी है हमारे ऋषि यों वैज्ञानिकों विद्वानों ने जीवन के और इस जगत के जो भी रहस्य सरल भाषा में बताए हैं सब विज्ञान आधारित हैं आवश्यकता है चराचर में विज्ञान का अनुभव करने की
भूल-सुधार 
Root News of India 2018-09-24 08:08:39
भूल-सुधार सवाल रोजगार !इज्जत तार-तार !बेवजह अत्याचार !प्रशासन बेकार !

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