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नारी क्या बनना चाहती है – पूज्या या भोग्या?

Root News of India 2018-11-26 18:51:04    EDITORSPICK 1152
अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी ।

ममेदनु क्रतुपतिरू सेहनाया उपाचरेत !! ( ऋग्वेद )

ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है “मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों का मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं ! ”

भारतीय मनीषियों ने सदैव से ही स्त्री-पुरुष को न केवल एक दूसरे का पूरक माना अपितु मनु स्मृति में स्त्री को पूजनीय कहकर समाज में प्रतिष्ठित किया गया !

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: !

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!

जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है.

जहां महिलाऑ काअपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं I

विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कह सकते है तभी तो पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित हो रहा है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और वेद माता गायत्री है ! नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :-

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्स! न त्यजन्ति गृहं हितत्।।

जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।

भारत में हमेशा से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया । भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ? किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए हम सत्यनारायण भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है ! नारी के प्रति किसी भी प्रकार के असम्मान को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है चाहे नारी शत्रु पक्ष की ही क्यों ना हो तो भी उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा भारत में है।

तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा भी है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-

अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।

इन्हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।

(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पाप नहीं है।)

भारत की यह परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को, विवाह के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को “ध्रुवतारे” जैसा स्थान प्राप्त हो गया। “इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती।

व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे? वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि भारतीय नारी ने कभी भी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग नहीं किया नहीं तो आर्य-वर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का ख़त्म हो गया होता।

परन्तु वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में भी नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का और इक्कीसवी सदी का यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण का काल है। आजकल मनुष्य जाति के इतिहास में ‘वस्त्र सभ्यता’ ने बड़ी धूम मचा रखा है !

बाजारवाद का यह मूल मन्त्र है कि “जो दिखता है वो बिकता है !” शायद इसलिए नारी को को लगभग हर विज्ञापन से जोड़ दिया जाता चाहे वो विज्ञापन सीमेंट का हो, चाकलेट का हो, अन्तः वस्त्र का हो, अथवा किसी मोबाईल के काल रेट का जो दो पैसे में दो लड़कियां पटाने की बात करता है ! और तो और विज्ञापन – क्षेत्र में करियर चमकाने की स्त्री की लालसा को आज का बाजार लगभग उसी पुरा पाषण-काल के दौर में ले जाने को आतुर है जहाँ लोगों को कपडे का अर्थ तक नहीं पता था पहनने की बात तो दूर की है ! यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आजकल की स्त्री वही कपड़े पहनती है जो बाजार चाहता है !

सेक्स और बाजार के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों अर्थात “एडवरटाइजमेंट” पर ही निर्भर है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है।

आजकल कलंक की भी मार्केटिंग होती है क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से नारी को रिझा रहा है और बोली लगा रहा है।

प्रसिद्द नारीवादी विचारक एवं लेखिका सिमोन द बोवुआर का एक प्रसिध्द वाक्य है- ‘स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है।’

पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह कोई पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद का विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है। हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है।

औरत की देह इस समय दूरदर्शन के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है।

केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है। भोग और कामोपभोग से तृप्ति उसे कभी नहीं मिलती है ! यौनिक स्वतंत्रता का मूल्य क्या है, यह केवल स्वच्छंदता और नासमझी भरी छलांग हो सकती है, अस्तित्व का खतरे में पड़ना जिसका परिणाम होता है। इसी तरह यौन शुचिता या कौमार्य का प्रश्न भी है। यह केवल स्त्रियों के लिए नहीं होना चाहिए। यह जरूरी है कि पारस्पारिक समर्पण एवं निष्ठा से चलने वाले वैवाहिक या प्रतिबध्द जीवन के लिए दोनो ओर से संयम का पालन हो। और इसकी समझ स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से अनिवार्य एवं आवश्यक हो। पुरुष को भी संयम एवं संतुलन के लिए प्रेरित करने में स्त्री की भूमिका सदा से रही है। इसलिए स्त्री संयम की अधिष्ठात्री है। उसे स्वाभाविक संयम एवं काम प्रतिरोध की क्षमता प्राकृतिक रूप से भी उपलब्ध है।

यौन शुचिता जीवन के रक्षण का ही पर्याय है और यौन अशुचिता नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से भी हमें विनष्ट करती है। संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है। कहावत भी है- ‘सब्र का फल मीठा होता है।’ इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो भागता है सुगंध के लिए परन्तु अतृप्त हो कर थक जाता है । सुगंध स्वयं उसके भीतर है। उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है। देह तो एक चारदीवारी है, एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है ।

वर्तमान दौर में नारी को उसे आधुनिक समाज ने स्थान अवश्य दिया है पर वह दिया है लालसाओं की प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं। एक लेखक ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूंजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।

पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों का बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ‘ कामायनी ‘ का रचनाकार ” नारी तुम केवल श्रृद्धा हो” से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-” स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ ” उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋग्वेद ) !

इतिहास में मैंने पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी. तब महिलाओं की तूती बोलती थी. फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले ! मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी ! आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सब कुछ नहीं होने लगा है. उदहारण के लिए आर्टिकल 498 – A को भला आज कौन नहीं जानता ? भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जा सकता है ! लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता. लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा. कभी हम मरेंगें, कभी तुम मरोगे !

समय करवट ले रहा है ! विचारक ‘जोड’ ने एक पुस्तक में लिखा है- ”जब मैं जन्मा था तब पश्चिम में होम्स थे, अब हाउसेस रह गए हैं क्योंकि पश्चिमी घरों से स्त्री खो गई है।” कही यह दुर्गति भारत की भी ना हो जाय क्योंकि भारत में यदि भारतीय संस्कृति यहाँ का धर्म और विचार अगर बचा है तो नारी की बदौलत ही बचा है ! अतः नारी को इस पर विचार करना चाहिए !

अब स्त्री को खुद को सोचना है कि वह कैसे स्थापति होना चाहती है पूज्या बनकर या भोग्या बनकर !

वैभव विशाल



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  • दीपों का त्योहार: दीपावली
    Rama Shanker Prasad 2018-11-03 09:27:21
    पटना, 3 नवंबर (आरएनआई)। भारत के त्योहार यहाँ की संस्कृति और समाज का आइना हैं । सभी त्योहारों की अपनी परंपरा व अपना महत्व है । भारत को त्योहारों का देश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि यहाँ हर माह कोई न कोई त्योहार आते ही रहते हैं।दीपावली हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है । यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है । यह शरद ऋतु के आगमन का समय है जब संपूर्ण वातावरण सुहावना एवं सुंगधित वायु से परिपूरित होता है। दीपावली त्योहार के संदर्भ में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं । अधिकांश लोग अयोध्यापति राजा राम के दुराचारी श्रीलंका के राजा रावण पर विजय के पश्चात् अयोध्या लौटने की खुशी में इस त्योहार को मनाते हैं । उनका मानना है कि कार्तिक मास की अमावस्या की इसी तिथि को अयोध्यावासियों ने पूरी अयोध्या नगरी में भगवान राम के स्वागत के उपलक्ष्य में दीप प्रज्वलित किए थे, तभी से उसी श्रद्‌धा और उल्लास के साथ लोग इस पर्व को मनाते चले आ रहे हैं । वैश्य एवं व्यापारी लोग इस दिन आगामी फसल की खरीद तथा व्यापार की समृद्‌धि हेतु अपने तराजू, बाट, व बही-खाते तैयार करते हैं तथा ऐश्वर्य की प्रतीक देवी ‘लक्ष्मी’ की श्रद्‌धापूर्वक पूजा करते हैं । इसी प्रकार बंगाली एवं दक्षिण प्रदेशीय लोगों की इस त्योहार के संदर्भ में मान्यताएँ भिन्न हैं। यह त्योहार हिंदुओं के लिए विशेष महत्व रखता है । त्योहार के लगभग एक सप्ताह पूर्व ही इसके लिए तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं । इसमें सभी लोग अपने घरों, दुकानों की साफ-सफाई व रंग-रोगन आदि करते हैं । इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों व साज-सज्जा के द्‌वारा घर को सजाते हैं । इस प्रकार वातावरण में हर ओर स्वच्छता एवं नवीनता आ जाती है ।दीपावली मूलत: अनेक त्योहारों का सम्मिश्रण है । दीपावली धनतेरस, चौदस, प्रमुख दीपावली, अन्नकूट तथा भैया-दूज का सम्मिलित रूप है । धनतेरस के दिन लोग भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं तथा सभी इस दिन नए बरतनों की खरीदारी को शुभ मानते हैं। चौदस के दिन बच्चों को उबटन द्‌वारा विशेष रूप से स्नान कराया जाता है । इसके बाद दीपावली का प्रमुख दिन आता है । अन्नकूट में गोबर को रखकर गोवर्धन पूजा को प्रारंभ करवाया जाता है । भैया दूज के दिन सभी बहनें भाइयों को टीका लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। दीपवली का त्योहार खुशियों का त्योहार है । इस दिन सड़कों, दुकानों, गलियारों सभी ओर चहल-पहल व उल्लास का वातावरण दिखाई देता है । सजी-धजी दुकानों पर रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए लोग बड़े ही मनोहारी लगते हैं । व्यापारीगण विशेष रूप से उत्साहित दिखाई देते हैं । सायंकाल सभी घरों में लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। इसके पश्चात् सभी घर एक-एक कर दीपों से प्रज्वलित हो उठते हैं । इसके बाद सारा वातावरण पटाखों की गूँज से भर जाता है । बच्चे, बूढ़े, जवान सभी प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ते हैं । घरों, दुकानों आदि में दीप प्रज्वलित करने के पीछे मनुष्य की अवधारणा यह है कि प्रकाशयुक्त घरों में लक्ष्मी निवास करने आती है । प्राचीन काल में तो लोग इस रात्रि को अपने दरवाजे खुले रखते थे। दीपावली के त्योहार का मनुष्य जीवन में विशेष महत्व है । लोग त्योहार के उपलक्ष्य में अपने घर की पूरी तरह सफाई करते हैं जिससे कीड़े-मकोड़ों व अन्य रोगों की संभावना कम होती है । महीनों की थकान भरी दिनचर्या से अलग लोगों में उत्साह, उल्लास व नवीनता का संचार होता है। परंतु इस त्योहार की दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यह है कि लक्ष्मी के आगमन के बहाने लोग जुए जैसी राक्षसी प्रवृत्ति को अपनाते हैं जिसमें कभी-कभी परिवार के परिवार बर्बाद हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त दिखावे के चलते लोग इन त्योहारों पर जरूरत से ज्यादा खर्च करते हैं जो भविष्य में अनेक परेशानियों का कारण बनता है। अधिक धुआँ छोड़ने वाले तथा भयंकर शोर करने वाले पटाखों को छोड़कर खुश होने की घातक परंपरा को भी अब विराम देने की आवश्यकता है । हम सबका यह नैतिक कर्तव्य है कि हम इन कुरीतियों से स्वयं को दूर रखें ताकि इस महान पर्व की गरिमा युग-युगांतर तक बनी रहे ।
  • हम पत्रकारों को बहुत कुछ सीखना है।
    Anand Mohan Pandey 2018-10-08 15:07:35
    शाहजहॉपुर, 8 अक्टूबर (आरएनआई)। पत्रकार लोकतत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है किन्तु यह चौथा स्तंम्भ बहुत कमजोर और जर्जर हो गया है। आय दिन पत्रकारों को हमले और उन्हें बेवजह थानों में बुलाया जाता है, मैने डाक्टरों और वकीलों में एक बहुत अच्छी चीज देखी है अगर किसी के ऊपर कोई परेशानी आती है तो सभी एक होकर हड़ताल पर चले जाते है, ये क्षेत्रीय सहित देशव्यापी हड़ताल भी हो सकती है और होती है उक्त विचार जनपद के वरिष्ठ पत्रकार एवं उपज के प्रदेश सचिव राकेश श्रीवास्तव ने दिये इस एकता के कारण ही शासन और सरकार मामले का तुरन्त सम्जानक हल निकाल लेते है वही दूसरी ओर पत्रकारों में एकता जैसे व्यवस्था का अच्छा खासा अभाव देखने को मिलता है तथा मीडिया पर अनावश्यक स्टेटमेन्ट एवं खबरें डालकर कम होता है तथा भिन्नता का लोग लाभ उठाते है।
  • वरिष्ठ जन और समाज
    Anand Mohan Pandey 2018-10-02 10:36:29
    शाहजहांपुर, 2 अक्टूबर (आरएनआई)। सीनियर सिटीजन या कहिए वरिष्ठ जन को समाज और सरकार की ओर से सम्मान मिलना हमारी संस्कृति का अभिन्न भाग है कदम कदम पर हमें उसकी सहायता और सम्मान के लिए तत्पर रहना चाहिए साथ ही वरिष्ठ से समाज की अपेक्षा रहती है कि वह अपने अनुभवों को नई पीढ़ी में बैठे वह नई पीढ़ी को सही दिशा निर्देश दें ताकि समाज और देश ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में किसी भी प्रकार की विसंगति या विकृति समाज में जन्म ना ले सके यह आरोप कि आज के बच्चे या नई पीढ़ी कुछ सीखना ही नहीं चाहती पूर्णतया गलत है क्योंकि अतीत में जब हम सक्षम थे आज की युवा पीढ़ी तरुण थी तब हमारा ध्यान कहीं और था ऐसा नहीं है कि आज वरिष्ठ नागरिक समाज देश और विश्व को कुछ प्रदान नहीं कर रहे हैं किंतु इस क्रम में अभी संस्कृति का रूप नहीं आया है इसका सबसे बड़ा कारण अतीत का अहम नामक रोग है जो पंचतत्व के इस शरीर में गहरे जा बैठा है जब तक हम सरल होने की आदत नहीं डालेंगे तब तक हम नामक रोग हमें कष्ट पहुंचाता ही रहेगा सरलता का तात्पर्य वाणी व्यवहार और धैर्य की सरलता से है समाज देश और इस विश्व में एकता बंधुत्व और अहिंसा की स्थापना तभी आगे बढ़ सकती है जब वरिष्ठ जन और अतीत के अनुभवों से ओतप्रोत समाज को दिशा दें वरिष्ठ होने का अर्थ यह नहीं है कि हमने अपने सभी कार्यों की इतिश्री कर ली बल्कि जीवन के इस मोड़ पर आकर युवाशक्ति भावना से ओतप्रोत होकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करना है संस्कृतियों को एकाकार करना है ताकि वैमनस्यता और मानवता का दंश हमें कभी न लग सके यह सनातन है और रहेगी हमारा आवागमन बना रहेगा तो क्यों अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में आए इन अच्छी परिस्थितियों की स्थापना और संचालन के लिए अनुभव और वास्तविकता के ज्ञान की आवश्यकता होती है जो वरिष्ठओं के पास होते हैं भले ही वह इन्हें पहचाने और किसी भी रूप में समाज को दें अथवा विमुख रहे
  • इस अपरिमेय सृष्टि के विज्ञानमय स्वरूप का अनुभव करें
    Anand Mohan Pandey 2018-09-26 14:25:45
    शाहजहांपुर, 26 सितम्बर (आरएनआई)। हमारा दृश्यमय ब्रह्मांड और अनगिनत अदृश्य ब्रह्मांड जो पूर्व में अस्तित्व में रह चुके हैं या भविष्य में अस्तित्व में आने वाले हैं विज्ञानमय हैं अर्थात समस्त दृश्य और अदृश्य सृष्टि पूर्ण रूप से विज्ञानमय है और विज्ञान के नियमों का पालन करती है जिसे हम प्रकृति कहते हैं वह भी विज्ञान के नियमों का पालन करती है किंतु प्रकृति ने विज्ञान को निरपेक्ष (absolute) नहीं रखा है हां नियमो के विपरीत जाने पर हमें कष्ट का अनुभव होता है यहां तक की भावनाओं का उदय होना उनका अनुभव होना आदि सभी कुछ विज्ञान आधारित हैं वास्तव में मृत्यु पदार्थ और ऊर्जा (आत्मा) के संरक्षण का प्रकृति द्वारा दिया गया उदाहरण है सृष्टि रचना कार ने मनुष्य के हाथों में विज्ञान नामक कामधेनु सौंप दी है इसका सम्मान और सदुपयोग करने से हमें दिया गया जीवन काल स्वर्णकाल के समान व्यतीत होगा इस विश्व के अन्य विषय भी विज्ञान के ज्ञान के प्रभाव के अनुरूप ही विकसित होते हैं दुनिया में जिन्हें हम आश्चर्य के विषय मान रहे हैं वे भी विज्ञान की ही देन है यह दूसरी बात है कि हम उसे स्तर के विज्ञान को समझ नहीं पा रहे हैं और यदि इन आश्चर्य के संरक्षण की बात करें तो वह भी विज्ञान के सहारे ही संभव है मनुष्य ने जब विज्ञान के नियमों के पालन करने में असावधानी बरती है तब तब उसे विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है और पड़ रहा है हमारा ज्ञान क्योंकि विज्ञान के बारे में बहुत थोड़ा है इसलिए हम बहुत कुछ भ्रमित रहते हैं प्रकृति के वरदान और आशीर्वाद भी हमें विज्ञान के रूप में ही मिलते हैं आदिकाल से लेकर वर्तमान तक या भविष्य में जो भी है जो कुछ भी हो रहा है या होगा उसमें विज्ञान की सहमति या असहमति छुपी है हमारे ऋषि यों वैज्ञानिकों विद्वानों ने जीवन के और इस जगत के जो भी रहस्य सरल भाषा में बताए हैं सब विज्ञान आधारित हैं आवश्यकता है चराचर में विज्ञान का अनुभव करने की
  • भूल-सुधार 
    Root News of India 2018-09-24 08:08:39
    भूल-सुधार सवाल रोजगार !इज्जत तार-तार !बेवजह अत्याचार !प्रशासन बेकार !
  • 1942 में फिरंगी सिपाहियों ने लसाढ़ी गांव पर ढ़ाया सितम, जिसमे 12 लोग शहीद एवं 25 लोगो को अंग्रेजी शासन ने भेजा था जेल
    Rama Shanker Prasad 2018-09-16 10:01:10
    आरा, 16 सितंबर (आरएनआई)। अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों द्वारा भारत के कई जगहों पर क्रांतिकारियों को आंदोलन करने पर मौत के घाट उतार दी वही पंजाब के जलियांवाला बाग में लोगों को फिरंगियों ने गोलियों से भून दिया था। ऐसी ही एक घटना बिहार के भोजपुर में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुई थी।15 सितंबर के दिन 1942 में भोजपुर के अगिआंव प्रखंड के लसाढ़ी में अंग्रेज सिपाहियों ने हिंसा का नंगा नाच किया था। सिपाहियों ने गांव को निशाना बनाकर चारों ओर से स्टेनगनों व एलएमजी जैसे अत्याधुनिक हथियारों से गोलियों की बौछार कर दी थी। घटना में 12 लोग शहीद हो गए थे, जबकि आठ बुरी तरह जख्मी हुए थे। सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था। उस समय भोजपुर जनपद (बिहार) का लसाढ़ी गांव भारत छोड़ो आंदोलन के कई नेताओं की शरण स्थली था। गांव के किसान अंग्रेजों से मुकाबला तो करते ही थे, साथ ही आसपास के गांव ढकनी, चासी आदि के किसानों को भी अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए प्रेरित करते थे।
  • हिंदी ब्रह्मांडीय चेतना की भाषा का पर्याय है
    Anand Mohan Pandey 2018-09-14 16:00:24
    शाहजहांपुर, 14 सितंबर (आरएनआई)। महान कवि साहित्यकार श्री सुमित्रानंदन पंत जी ने कहा था हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है साथ ही तमाम महान साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने हिंदी को महान ही नहीं बल्कि इसे एक जीवन शैली की उपाधि से विभूषित किया कहना ना होगा कि हिंदी तो कई संस्कृतियों का स्रोत है किंतु आज स्थिति यह है कि हिंदी के रखवालों को हिंदी रास नहीं आ रही बातें तो हिंदी के प्रचार-प्रसार और उत्थान की की जाती हैं किंतु कथनी और करनी में बड़ा अंतर मिलेगा तमाम विभागों में दीवारों पर लिखा मिलता है कि हम हिंदी में भी प्रार्थना पत्र फॉर्म आदि स्वीकार करते हैं उनके द्वारा प्रेषित लिफाफों पर लिखा होता है हम हिंदी में भी पत्राचार आदि स्वीकार करते हैं उनके द्वारा यह उदाहरण बताते हैं कि हमें हिंदी स्वीकार करने में दुविधा है अरे यह क्यों नहीं लिखते कि हम अमुक कार्य हिंदी में ही स्वीकार करते हैं कितना असहज लगता है जब हम भारत भूखंड निवासी हिंदी या अन्य भारतीय भाषा के अतिरिक्त किसी आयातित जवान में अपने सुख-दुख या प्रसन्नता को बांटते हैं भाषाएं तो सभी सम्मानजनक हैं किसी भाषा की आलोचना का अर्थ है कि हम अपनी भाषा से अनभिज्ञ हैं कहने का अर्थ है कि भारत भूखंड की भाषा हिंदी की भारतीय सुगंध अनोखी ही है आज की स्टेटस सिंबल वाली भाषा में ना तो भारतीयता की सुगंध है और ना ही कोई छांव प्रतिवर्ष आने वाला 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस यह याद दिलाता है कि हम अपनी ही जुबान में हंसे रोए चिल्लायें ताकि ऐसा महसूस हो कि हम अपनों के बीच में हैं और अपनों से ही कुछ साझा कर रहे हैं यह स्वयं सिद्ध है कि वैज्ञानिक दार्शनिक विद्वान और विचारक सदैव अपनी ही भाषा में सोचते हैं विचार करते हैं मन से बाहर आने पर यह विचार भाषाई पर्यावरण के अधीन हो जाते हैं और विस्तार ले लेते हैं दुख और दया के भाव तो उन भद्र जनों के प्रति उत्पन्न होते हैं जो हिंदी या भारतीय भूखंड की अन्य भाषा को अपनाने या उसे समृद्ध ना करके आयातित भाषा में अपना राग अलापते हैं ऐसी स्थिति में लगता है कि भाषा रूपी निर्धनता यहीं से शुरू होती है हिंदी के विस्तार के लिए हमें अपनी चेतना को समृद्ध करना होगा हिंदी सभी भाषाओं को सम्मान प्रदान करती है यह हम हैं कि हिंदी के विस्तार और उसकी विस्तृत प्रकृति का अनुभव नहीं कर पा रहे। हिंदी तो ब्रह्मांड ही चेतना की भाषा का पर्याय है
  • भारत में जातिवाद से दरकती लोकतंत्र की दीवारें
    Laxmi Kant Pathak 2018-08-29 11:24:31
    हरदोई, 29 अगस्त (आरएनआई) I भारत देश और यहाँ की मिट्टी की समरसता की विश्व मे कोई सानी नही रही है। यहां बहु धर्म ,विभिन्न जाति, वर्ग के होते हुये भी देश शान्ति का पैगाम देता चला आ रहा था।लेकिन भारत की खादी ने अपनी अपनी दुकानों को चलाने के लिये अपने अपने हिसाब से समाज को तोडने के हथकंडे अपनाकर अपना व अपने निजी स्वार्थ को साधने का काम किया। देश हित समाज हित पर किसी ने ध्यान नही दिया।कानून सविधान सब अपने अनुकूल बना लिये जिससे वह भी डर समाप्त हो गया। भारतीय सविधान मे समता का अधिकार ,देकर भी अधिकार नही है।सविधान मे एक शब्द लिखा गया धर्मनिरपेक्ष शायद इसका अर्थ सभी धर्मो का सममान करना होगा लेकिन भारत की राजनीति मे कानून कायदा केवल कागजो तक ही सीमित है। आज जब भाजपा सरकार सत्तारूढ़ है तो पूरा विपक्ष भाजपा पर मुस्लिम विरोधी सरकार का तोहमत मढती रहती है लेकिन यही काग्रेंस कुर्सी के लोभ मे इतना गिर गयी की मां भारती के दो भाग कर दिये।लेकिन कुर्सी नही छोडी। आजादी का जश्न मनाने वाला भारत कभी आजाद हुआ ही नही केवल रग बदला गोरै से काले हो गये लेकिन फूट डालो राजकरो की नीति भारतीय राजनीति से जा ही नही पायी। समाज बाटने मे क्षेत्रीय दलो का अहम रोल रहा हैँ।समाज वादी पार्टी के सस्थापक मुलायम सिह ने पिछडी जाति को समाज से तोडकर राजनीति की और वही तत्कालिन प्रधानमंत्री वीपीसिंह ने मजबूती प्रदान कर दी।दूसरी तरफ भाजपा द्वारा पोषित बहुजन समाज पार्टी नै केवल दलित राजनीति कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक तिजोरियों को भरा। समाज को विभिन्न सरकारों ने वोटबैंक को साधने के लिये वर्ग बिशेष की राजनीति कर छिन्न भिन्न कर डाला। जिसने समाज मे एकरूपता लाने के बजाय आज बटवारे की स्थिति खडी कर दी है।पिछडा दलित, सबर्णो मे बटा हिन्दू समाज देश को कैसे आगे ले जा सकता है।इसी समस्या से निपटने के लिए अगडो पिछडो ने भाजपा पर भरोसा व्यक्त कर प्रचण्ड बहुमत से सत्ता मे लाये लेकिन दलित प्रेम के चक्कर मे फसी सरकार ने समाज के 78% लोगो के खिलाफ एससी/एसटी विल लाकर लोगो को निराश कर अपने पैरो मे कुल्हाड़ी मारने से कतई कम नही है।जिस तरह भाजपा के प्रति अगडो पिछडो मे पनपता आक्रोश भाजपा को अर्श से फर्श पर ला सकता है जिसके लिये गुजरात की जुगलबंदी ही जिम्मेदार होगी।जिस देश समाज के लिये अपनी जान निछावर करने वाले शहीदों ने भी शायद यह नही सोचा होगा कि जिस धरती माता के लिये बलिवेदी पर चढ कर जान निछावर कर रहे है उसकी खादी द्वारा इतनी बुरी गति की जायेगी।आजादी से अबतक जितनी सरकारे सत्ता मे आयी विभाजन के अलावा दूसरा काम ही नही किया जबकि शपथ लेते समय देश की एकता अखण्डता भारतीय सविधान के प्रति सच्ची निष्ठा की शपथ लेकर सविधान की आत्मा को मारने के लिये रात दिन एक किये रहते है।जैसा की बर्तमान सरकार ने किया है।इन आचरणो से समाज मे बढती बैमन्स्व की भावना देश को विभाजन की ओर ले जाती दिखायी दे रही है।
  • अंधेर नगरी चौपट राजा
    Rama Shanker Prasad 2018-08-27 19:24:47
    पटना, 27 अगस्त (आरएनआई) I 2019 लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज चुकी है और सभी राजनीतिक दल मोदी को .... पछाड़ देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते और मोदी ने भी 56 इंच का सीना 2014 से 2018 अगस्त तक घट चूका है और 2014 का बयान सबका साथ- सबका विकास में भी मिलावट दिखने लगा है। मोदी जी को 2019 में चुनाव जीतने के लिए विकास से ज्यादा भरोसा अब 2. एस सी/ एस टी एक्ट3. बाजपेयी जी की अस्थि
  • एक युग का चिरनिद्रा में सो जाना
    Root News of India 2018-08-24 18:22:15
    नई दिल्ली, 24 अगस्त (आरएनआई) I कुलदीप नैयर जी का चिरनिद्रा में सो जाना पत्रकारिता में सन्नाटे की ख़बर है। पत्रकारिता के एक युग का चलता फिरता साक्ष्य खत्म हो गया और पीछे छूट गईं उनकी लिखी कई किताबें, अनेकों लेख और अनगिनत साक्षात्कार। एक पत्रकार अपने पीछे भला और क्या ही छोड़ सकता है। उनके साथ ही गुजर गया पत्रकारिता जगत का ऐसा तारा, जिसकी चमक उम्र के बढ़ते हर पायदान पर लगातार बढ़ती चली गई।
  • महान पत्रकार एवं बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे कुलदीप नैयर
    Anand Mohan Pandey 2018-08-24 15:04:33
    शाहजहांपुर, 24 अगस्त (आरएनआई) I वर्तमान में पत्रकारिता को एक चेतना तत्व के रूप में स्थापित करने वाले महान साधक वरिष्ठ पत्रकार श्री कुलदीप नैय्यर जी आज शारीरिक रूप में हमारे मध्य नहीं रहे किंतु पत्रकारिता और मानवता के लिए उनके द्वारा स्थापित किए गए मूल्य हम सब का सदैव मार्गदर्शन करते रहेंगे श्री नैय्यर जहां उच्च स्तरीय पत्रकार लेखक एवं उच्चायुक्त जैसे पदों पर रहे वही एकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर वह सदैव प्रथम स्थान देने वाले भी रहे उन्होंने तमाम भारतीय समाचार पत्रों एवं विदेशी समाचार पत्रों में अपनी कलम को एक नई पहचान के रूप में स्थापित किया पत्रकारिता के इस महान साधक को तमाम पत्रकार जनों ने अपने विचार प्रेषित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए इस क्रम में उत्तर प्रदेश हरदोई से आर एन आई के ब्यूरो प्रमुख श्री लक्ष्मी कांत पाठक जी ने कहा है कि पत्रकार कुलदीप नैयर भारत में पत्रकारिता एवं लेखन के नील गगन के दीप्तिमान नक्षत्र थे वह उनकी प्रतिभा के धनी होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण पदों कर रहे तथा अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए अपने संदेश में गांधी साप्ताहिक पत्र के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री ओंकार मनीषी ने कहा कुलदीप नैय्यर जी ने अपने समय की पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व किया वह यथार्थता की पत्रकारिता में विश्वास रखते थे प्रेषण के इस क्रम में उपजा के प्रदेश अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार संजीव गुप्ता ने कहा कि नैय्यर जी अभिव्यक्ति एवं लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील तथा पत्रकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे पत्रकार शैलेन्द्र बाजपेयी ने नैयर जी को लोकतंत्र का सच्चा पत्रकार बताया क्रम को जारी रखते हुए पत्रकार विमल सक्सेना ने कहा श्री नैयर उन गिने चुने अखबार नवीसों मैं ऐसे थे जिन्होंने अपनी आंखों के सामने आधुनिक भारत के इतिहास को बनते देखा थापत्रकार सरदार शर्मा मोहम्मद इरफान आरिफ सिद्दीकी व पुनीत त्रिवेदी ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में श्री कुलदीप नैयर को पत्रकारिता लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी तथा बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी बताया निश्चित रूप से नैय्यर जी का जाना पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में हुई अपूरणीय क्षति है
  • भारत के नीलगगन का देदीप्यमान नक्षत्र वरिष्ठ पत्रकार/लेखक कुलदीप नायर सदा के लिये हुआ अस्त
    Laxmi Kant Pathak 2018-08-24 11:04:13
    हरदोई, 24 अगस्त (आरएनआई) I भारत के क्षितिज पर14 अगस्त  सन 1924 को सियालकोट की मिट्टी मे कुलदीप नायर के रुप एक नक्षत्र उदय हुआ।जिसकी प्रारंभिक शिक्षा सियालकोट मे शुरू हुई।अदभुत प्रतिभा के धनी कुलदीप नायर ने कानून की डिग्री लाहौर से प्राप्त की।इसके बाद पत्रकारिता की डिग्री सयुंक्त राज्य अमेरिका(USA) से प्राप्त की।बहुमुखी प्रतिभा के धनी कुलदीप नायर भारत सरकार के प्रेस सूचना अधिकारी रहे।बाद मे वह  यूएनआई, पीआईबी, द स्टेसमैन,इण्डियन एक्सप्रेस, से जुडे रहे।कुलदीप नायर 25बर्षों तक लन्दन से प्रकाशित द टाइम्स मे काम करते रहे।इतना ही नही श्री नायर ने देश के बाहर भी भारत को गौरवान्वित किया।सन 1990मे ब्रिटेन के उच्चायुक्त नियुक्त हुये।1996मे  सयुंक्त राष्ट्र सघ को जाने वाले प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य भी रहे।इसके बाद 1997मे राज्य सभा के मनोनीत सदस्य के रूप मे निर्वाचित हुये।श्री नायर ने अपने जीवन मे बहुत सी पुस्तकें भी लिखी है।विटवीन द लाइन्, डिस्टेन्स नेवर,ए टेल आफ द सब कन्टीनेन्ट, इण्डिया आफ्टर नेहरू, वाल एट वाघाआदी प्रमुख है। द डे लुक्स ओल्ड जिसमे नायर जी ने अपनी आत्म कथा लिखी है काफी चर्चित हुई। पत्रकारिता एव लेखन के क्षेत्र मे श्री नायर को कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन1999मे नार्द वेस्ट यूनिवर्सिटी द्वारा एल्मिनी अवार्ड दिया गया।इतना ही नही सरहद सस्था द्वारा नामदेव राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किये गये।23दिसंबर 2015को रामनाथ गोयनिका स्मृति से आजीवन उपलब्धि के  रूप मे पुरस्कृत किये गये।देश व विदेश मे भारत माता की अपनी लेखनी से अपने व्यक्तित्व से सेवा करने मे नायर जी का कोई विकल्प नही था।पत्रकारिता व लेखन के क्षेत्र मे श्री नायर जी ने कई सोपान लिखे है। 94साल की आयु मे 23अगस्त 2018को भारत का यह देदीप्यमान नक्षत्र दिल्ली मे सदा सदा के लिये पश्चिम मे अस्त हो गया।मै लक्ष्मी कान्त पाठक पत्रकार हरदोई रीजनल ब्यूरो चीफ ROOT NEWS OF INDIA (RNI) NEWS AGENCY रीजन लखनऊ अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुये नमन करता हूँ।
  • सिसकती मानवता टूटता लोकतंत्र
    Laxmi Kant Pathak 2018-08-23 10:25:42
    हरदोई, 23 अगस्त (आरएनआई) I माँ भारती के वक्षस्थल पर खडा भारत जैसा विशाल राष्ट्र जिसकी सस्क्रति ,सभ्यता, से प्रेरित होकर भगवान विष्णु ने राम, क्रष्ण, जैसे रुप रखकर अनेक बार अवतार लेकर अपने आचरणो से माँ भारती को गौरवान्वित किया। वही दूसरी ओर भारतीय सस्क्रति व समाज को छिन्न भिन्न करने के लिये हूण, अफगान, मुगलो ने हमले कर हमारी सस्क्रति हमारी परम्पराओं को मिटाने का प्रयास किया लेकिन इतना सब होने के बाद भी राम क्रष्ण की धरती पर से परिवारवाद सामाजिकता सभ्यता को कोई मिटा नही सका।भारत की सभ्यता बशुधैब कुटुम्बकम को आत्मसात करती रही।इसी बीच हमारे देश पर गोरे अग्रेजो ने कब्जा जमा लिया। उनकी नीति फूट डालो राज करो थी जिसके आधार पर उन्होने ने देश के समाज को तोडने के भरसक प्रयत्न। किये लेकिन वीरो की जननी माँ वसुंधरा के लालो ने गोरो की एक न चलने दी आखिरकार गोरो को देश छोडकर भागना ही पडा।परिणामस्वरूप भारत आज भी बशुधैब कुटुम्बकम की सस्क्रति मे पुष्पित पल्लवित रहा।आज भारत की राजनीति मे खद्दरधारियो ने भी अग्रेजो की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।वर्ग विशेप ,धर्म विशेष, जातिवाद जैसे मुद्दो पर राजनीति कर केवल वोट राजनीति से सरोकार है। भारत का गौरव, सस्क्रति, सभ्यता ,विकास गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार जैसी भीषण सम्सयाओ पर चर्चा करना भी भारतीय राजनेताओं को रास ही नही आ रहा है। सरकार कैसे बने गद्दी पर बैठने की लालसा मे सामाजिकता को ताख पर रख दिया गया है। भारतीय लोकतंत्र मे सविधान को सर्वाधिक मान्यता देते हुये न्यायपालिका को सर्वोच्च स्थान दिया गया। लेकिन सत्ता के लोभवश राजनेता सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को स्वय न मानकर भारतीय सविधान का खुला मजाक देश की सर्वोच्च चौपाल ससद मे करते दिखायी पडते है। और समाज को जातिवाद के आधार पर बाटकर उसी जनता के खिलाफ जिसके वोट की ताकत से उस स्थान पर पहुंचे कानून बनाकर शान्ति व समरसता से जी रहे समाज को आपस मे लडाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक कर देश की सस्क्रति से खिलवाड़ करने से भी नही चूकते।सीमा पर मरते माँ भारती के लाल,देश के अन्दर मरता अन्नदाता, वर्ग बिशेष ,जाति बिशेष मे बटा समाज आज लोकतंत्र की दीवारों मे दरार नही पैदा कर रही है।इसी युग मे जन्मे भारत के महान नेता ,भारत रत्, पूर्व प्रधानमंत्री पण्डित अटलविहारी वाजपेयी जिनका अभी अभी महाप्रयाण हुआ है ने इसी ससद मे अपनी 13दिन की सरकार के समय भाषण दिया था कि यदि पार्टियों के तोडने या खरीद फरोख्त से उन्हे बहुमत मिलता है तो वह ऐसा मत चीमटे से भी नही छुयेगे। ऐसा पाप हम नही कर सकते।उन्ही की स्थापित पार्टी आज सरकार मे रहने के लिये देश व समाज को जातिवाद मे बाँटकर भारतीय सविधान के अनुच्छेद 15 को धता बताकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय को भी अपनी शक्ति दिखाने मे नही चूक रही है।इन आचरणो से जहाँ एक ओर मानवता तार तार होती दिख रहीहै। वही दूसरी ओर लोकतत्र की दीवारे भी दरकती दिख रही है।

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