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सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार

Shyam Chandra Srivastav 2020-02-04 12:44:39    MEDITATION 4347
सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार
सुल्तानपुर, 4 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विकासखंड धनपतगंज के खुनका बहादुरपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण जी का प्राकट्य उत्सव हुआ।भव्य झांकी और मंगलगीत के साथ सुंदर भजनों से पूरा माहौल भक्ति मय हो गया। संगीतमयी कथा रूपी गंगा में भगतप्रेमी श्रोताओं ने अवगाहन स्नान किया।गौरतलब है कि आदि गंगा गोमती के तट पर बसे सुरम्य गांव खुनका में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है।कथाव्यास पं.आनंदशास्त्री जी के श्रीमुख से सोमवार को सुखदेव द्वारा राजा परीक्षित की जिज्ञासा को उत्तम तरीके से शांति प्रसंग और भक्ति अजामिल की कथा का वर्णन किया गया। आकाशवाणी सुनकर आततायी कंस ने बहनोई बासुदेव और बहन देवकी को कारागार में बंद कर दिया,और नववें पुत्र से अपना बध होने के डर से सभी नवजात शिशुओं की हत्या करने का भी पाप किया ।श्री शास्त्री जी बताया कि कर्मो का फल मिलना निश्चित है।धरा को पापमुक्त करने के लिए भादों कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधीरात प्रभु को अवतरित होना पड़ा।प्रभु की लीला का बखान करते हुए कथाव्यास ने कहा कि बासुदेव ने उफनाई यमुना जी को पार कर नंद जी के घर शिशु रूपी प्रभु को पहुँचाया। इधर नंद जी के घर लाला होने की खबर पूरे गोकुल में तेजी से फैल गई।दशो दिशाओं में बधाई एवं मंगलगीत होने लगे। कथा प्रसंग के दौरान आयोजक ध्रुव नारायण तिवारी सपत्नीक भगवान को माखन मिश्री का भोग लगया और आरती उतारी। भव्य झांकी देखकर और भजनों पर श्रोता गण थिरकने हुए खुशिया मनाई।एक दूसरे को बधाई दी।

आज की कथा में प्रह्लाद नारायण तिवारी, उदय नारायण तिवारी, दिप नारायण तिवारी, इन्द्र नारायण तिवारी, जय नारायण, पूर्व प्रधान रिखीराम मिश्र,शंकर प्रसाद यादव, शिव चन्द,नर्मदा प्रसाद,मानिक राम मिश्र,हनुमान तिवारी,पवन तिवारी, अमन, हरिशंकर शुक्ल,महेश पण्डित,बिमलेश तिवारी समेत सैकड़ो महिलाएं और श्रोता मौजूद रहे।कथा समापन आठ फरवरी को विशाल भंडारे के साथ होगा।






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राशिफल, 23 फरवरी 2020
Suresh Raheja 2020-02-23 08:27:46
मेष राशिफल: काम की अधिकता रहेगी। नौकरी में मनचाहा स्थानांतरण व पदोन्नति के भी योग बन रहे हैं। आर्थिक निवेश सोच-समझकर करें। पारिवारिक कार्यों में आपकी पूछ परख बढ़ेगी।
जब भक्त की पुकार पर पहुंची थी भवानी
Rupesh Kumar 2020-02-22 21:06:03
गोपालगंज, 22 फरवरी 2020, (आरएनआई )। जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सिवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां मां थावेवाली का एक प्राचीन मंदिर है. मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भी भक्तजन पुकारते हैं. ऐसे तो साल भर यहा मां के भक्त आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवारात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है.
इस शिव मंदिर को तोड़ने आया था मो. गजनी, चमत्कार देख लौटा वापस
Rupesh Kumar 2020-02-21 14:39:06
बक्सर, 21 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार के बक्सर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर ब्रह्मपुर है। यही पर बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ का मंदिर है। मुस्लिम शासक मोहम्मद गजनी ब्रह्मपुर आया था। यहां के लोगों ने गजनी से अनुरोध किया कि इस शिव मंदिर को नहीं तोड़े नहीं तो बाबा उसका विनाश कर देंगे। इसी बात को लेकर गजनी ने बाबा ब्रह्मेश्वर को चैलेंज किया था, लेकिन भगवान का चमत्कार देख वह वापस लौट गया था।
जहां द्रोपदी ने की थी भगवान शिव की आराधना
Rupesh Kumar 2020-02-21 14:35:23
अरेराज, 21 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार के मोतिहारी शहर से 28 किमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित अरेराज में भगवान शिव का प्रसिद्व मंदिर है जो सोमेश्वर शिव मंदिर कहलाता है। बिहार में तीन शिव धाम प्रसिद्ध हैं। जिनमें अरेराज का स्थान सबसे उपर है। इसके बाद मुजफ्फरपुर के गरीब नाथ व बक्सर, ब्रह्पुर के शंकर मंदिर आते हैं। माना जाता है कि सोमेश्वरनाथ एक कामनापरक पंचमुखी शिवलिंग हैं। जिसपर सावन महीने में कमल का फूल व गंगा जल चढ़ाने से सारी मनोकामना पूरी होती हैं।इस मंदिर का जिक्र स्कंद, पदम व बाराह पुराण में भी है। त्रेता युग में अपनी पत्नी सीता के साथ विवाह कर जनकपुर से अयोध्या लौटने के क्रम भगवान राम ने यहां पूजा की थी। इसी कारण, हर वर्ष जनकपुर में अगहन पंचमी को आयोजित होने वाले राम विवाह में अयोध्यवाशी भाग लेते हैं। और लौटते वक्त अरेराज मंदिर में जल जरूर चढ़ाते हैं। वर्ष 1983 में प्रसिद्ध साहित्यकार सच्चितानंद वात्स्यायन (अज्ञेय) व शंकर दयाल सिंह की खोजी टीम आई थी। उन्होंने भी इस तथ्य की पुष्टि की। रोटक व्रत कथा के मुताबिक, द्वापर में अज्ञातवास के दौरान राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों व पत्नी द्रौपदी के साथ यहां पूजा की थी।
महाशिवरात्रि पर 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग, विष दोष व सर्प दोष से मिलेगी मुक्ति
Root News of India 2020-02-20 14:26:19
इस बार महाशिवरात्रि बेहद खास होगी। महाशिवरात्रि बेहद फलदायी होने के साथ ही ज्‍योतिषिय रूप से भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। इस मौके पर 117 वर्ष बाद ग्रहों का दुर्लभ योग बन रहा है। ज्‍योतिषियों के अनुसार इससे व्‍यक्ति के जन्‍म कुंडली में बने विष दोष और सर्प दोषों से कुछ उपाय करने से मुक्ति मिलेगी। इस बार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि शुक्रवार 21 फरवरी को महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। ज्योतिष में जब सूर्य कुंभ राशि और चंद्र मकर राशि में होता है तब फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात ये पर्व मनाया जाता है। ज्‍योतिषियों का कहना है कि महाशिवरात्रि रात्रि का पर्व है और 21 फरवरी की रात चतुर्दशी तिथि रहेगी, इसलिए इस साल ये पर्व 21 फरवरी को मनाया जाएगा। इस बार 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग शिवरात्रि पर बन रहा है शनि अपनी स्वयं की राशि मकर में और शुक्र ग्रह अपनी उच्च राशि मीन में रहेगा। यह एक दुर्लभ योग है। 25 फरवरी 1903 को ठीक ऐसा ही योग बना था। इस साल गुरु ग्रह भी अपनी राशि धनु में हैं इस योग में शिव पूजा करने पर शनि, गुरु, शुक्र ग्रहों के दोषों से भी मुक्ति मिल सकती है। 21 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा पूजन के लिए और नए कार्यों की शुरुआत करने के लिए यह योग बहुत ही शुभ माना गया है। विष योग से दूर होंगे सारे कष्ट शिवरात्रि पर शनि के साथ चंद्र भी रहेगा। शनि-चंद्र की युति की वजह से विष योग बन रहा है। *शिवरात्रि पर विष योग करीब 28 साल पहले 2 मार्च 1992 को बना था, इस योग में शनि और चंद्र के लिए विशेष पूजा करनी चाहिए। बुध-आदित्य और सर्प योग भी रहेंगे शिवरात्रि पर ज्योतिष आचार्य जी के अनुसार बुध और सूर्य कुंभ राशि में एक साथ रहेंगे। इस वजह से बुध-आदित्य योग भी बनेगा। इसके अलावा इस दिन सभी ग्रह राहु-केतु के मध्य रहेंगे, इस वजह से सर्प योग भी बन रहा है। शिवरात्रि पर राहु मिथुन राशि में और केतु धनु राशि में रहेगा। शेष सभी ग्रह राहु-केतु के बीच रहेंगे.......!!
गया : देश का अनूठा धार्मिक स्थल है विष्णुपद मंदिर
Rupesh Kumar 2020-02-19 17:15:00
गया, 19 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विश्व में मुक्तिधाम के रूप में विख्यात पितरों के श्राद्ध अौर तर्पण के लिए बिहार के गया धाम से श्रेष्ठ कोई दूसरा स्थान नहीं है। मान्यता के अनुसार गया में भगवान विष्णु पितृ देवता के रुप में निवास करते हैं। कहा जाता है कि गया में श्राद्ध कर्म करने के पश्चात भगवान विष्णु के दर्शन करने से व्यक्ति को पितृ, माता अौर गुरु के ऋण से मुक्ति मिल जाती है। यहां अति प्राचीन विष्णुपद मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के पदचिन्ह आज भी मौजूद हैं। ये मंदिर फल्गु नदी के किनारे स्थित है। इसे धर्मशीला के नाम से जाना जाता है। इनके दर्शन से व्यक्ति को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल है, बिहार का यह शिव मंदिर
Rupesh Kumar 2020-02-17 20:58:54
समस्तीपुर, 17 फरवरी 2020, (आरएनआई )। समस्तीपुर जिला मुख्यालय से करीब 17 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम मोरवा प्रखंड के सुल्तानपुर मोरवा में स्थापित हैं- खुदनेश्वर महादेव।मंदिर का नाम खुदनी नामक मुस्लिम महिला के नाम पर रखा गया है, जिसको इस स्थान के खुदाई के दौरान शिवलिंग मिला और तत्पश्चात वह भगवान शिव की भक्त बन गयी। खुदनी बीवी की मृत्यु प्रश्चात उसकी इच्छानुसार उसके पार्थिव शरीर को शिवलिंग से एक गज दक्षिण में दफना दिया गया। इसके बाद इस स्थान का नाम खुदनी बीवी के नाम पर खुदनेश्वर स्थान रख दिया गया।यह सामाजिक सौहार्द एवं साम्प्रदायिक एकता का अनुपम स्थल है। यहां बाबा खुदनेश्वर के शिव¨लग एवं खुदनी बीबी के मजार की पूजा अर्चना श्रद्धा एवं विश्वास के साथ की जाती है। यह स्थल अपने आप में अद्वितीय है।समस्तीपुर जिला मुख्यालय से बस के द्वारा दक्षिण-पश्चिम में 15 किमी पर गंगापुर चौक है। वहां से लगभग 2 किमी दक्षिण खुदनेश्वर धाम अवस्थित है। ताजपुर चौक से 5 किमी दक्षिण-पूर्व की ओर खुदनेश्वर धाम अवस्थित है जहां से निजी वाहन के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। मंदिर के दक्षिण दिशा में मात्र 5 किमी की दूरी पर एनएच 103 पर सरैया चौक है, जहां से निजी वाहन द्वारा धाम तक पहुंचा जा सकता है।
सामान्यतया ग्राम देवता का कोई नाम नहीं होता, उन्हें डीह बाबा, काली माई, बरहम बाबा के नाम से जानते है लोग
Rupesh Kumar 2020-02-16 16:39:50
पटना, 16 फरवरी 2020, (आरएनआई )। सामान्यतया ग्राम देवता का कोई नाम नहीं होता, उन्हें डीह बाबा, काली माई, बरहम बाबा के नाम से जानते हैं। इनका न कोई स्वरूप होता है और न ही इन्हें छत के नीचे रखा जाता है। गाँव के बाहर बड़ या पीपल के पेड़ के नीचे इनका निवास होता है। मिट्टी के लिपे पिण्ड या एक बड़े पत्थर को प्रतीक मानते हुए इनकी पूजा होती है। ब्रह्म बाबा गांव के चौकीदार देव होते हैं। हर शुभकार्य में उनका आशीर्वाद लिया जाता है। बचपन की मस्ती से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक ब्रह्म बाबा का वास जिस पीपल के पेड़ में होता है उसकी डालियों तक से जुड़ी होती है स्मृतियां। उस देवत्व पेड़ की छांव में काफी सुकून मिलता है.उसकी शीतल छाया मानो आशीष देती हो.समय के साथ सबकुछ बदल गया.गाँव अब अपनापन खो चुका.समय चक्र ने सबकुछ बदल दिया पर आज भी जो खास है जो अपने सम्मोहन से अपनी ओर खिंचते है वह है ब्रह्म बाबा. इनके दर से कोई खाली नहीं जाता यहां सबकी मुरादें पूरी होती मिट्टी में लोटते इंसान की किस्मत कैसे पलट जाती है यह हर वह इंसान देख चुका है जिसका जुड़ाव गांव से है व गांव के सबसे शक्तिशाली देवता ब्रह्म बाबा से भी.गर्मी की छुट्टियों में जब मैं गांव जाता था तब सोते वक्त मेरी दादी मुझे घर के पिछवाड़े लगे एक विशाल पीपल का पेड़ दिखाकर कहती कि बरहम बाबा यहीं बैठते हैं...झूठ बोलोगे तो बरहम बाबा बीमार कर सकते हैं...आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ोगे तो पटक सकते हैं.....ठंड में जब आग जलती है तो तापते भी थे बरहम बाबा...और कभी गर्मी की दोपहरिया में अपने गंवई दोस्तों के साथ जब उस पीपल पेड़ के नीचे जाता तो सांय..सांय की आवाज के साथ मन में एक डर समा जाता कि गलत करुंगा तो बरहम बाबा यहीं पटक देंगे.यह सिर्फ़ अनुभूति नही है.पुराने यादों को फ़िर से ताज़ा करने का बहाना भर नही है . मन रुआंसा हो जाता है.
नगर रक्षिणी देवी है पटनेश्वरी
Rupesh Kumar 2020-02-16 16:30:33
पटना, 16 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटन देवी मंदिर शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है. देवी भागवत और तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, सती की दाहिनी जांघ यहीं गिरी थी. नवरात्र के दौरान यहां काफी भीड़ उमड़ती है. सती के 51 शक्तिपीठों में प्रमुख इस उपासना स्थल में माता की तीन स्वरूपों वाली प्रतिमाएं विराजित हैं. पटन देवी भी दो हैं- छोटी पटन देवी और बड़ी पटन देवी, दोनों के अलग-अलग मंदिर हैं.
पति के अपमान से आहत होकर जहां यज्ञ कुंड में कूद पड़ी थी सती
Rupesh Kumar 2020-02-14 20:36:19
पटना, 14 फरवरी 2020, (आरएनआई )। अनादि काल से शक्ति उपासना की पुण्य भूमि बिहार के तीन शक्ति पीठों (गया सर्वमंगला, छिन्न मस्तिका, हजारीबाग, झारखंड तथा अम्बिका भवानी आमी दिघवारा सारण) में मूर्धन्य आमी वाली अम्बिका भवानी के सच्चे दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। चाहे दक्षिणमार्गी वैष्णवी शक्ति साधक हो या वाममार्गी कपालिनी के साधक। बहरहाल साधकों को सिद्धियां एवं श्रद्धालुओं की मुरादें पूरी करती हैं सर्वेश्वरी। चाहे शरद नवरात्र हो, बासंतिक नवरात्र हो या फिर चैत्र नवरात्र श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा सकती है.
यहां चिता की तपिश पर होती है साधना
Rupesh Kumar 2020-02-08 14:59:49
दरभंगा, 8 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.
भक्ति, साधना और ईश्वर के प्रति आसक्ति को कोई नहीं नकार सकता
Root News of India 2020-02-07 21:36:52
संत रविदासभक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है और कहा भी क्यों न जाये आखिर कबीर, रैदास, सूर, तुलसी इसी युग की तो देन हैं जिन्होंने भगवान के सगुण और निर्गुण रूप को हर व्यक्ति तक पंहुचाया। यही वो दौर था जब इन संत कवियों ने मानवीय मूल्यों की पक्षधरता की और जन जन में भक्ति का संचार किया। इन्हीं में से एक थे संत रविदास। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं।संत रविदास का जन्मवैसे तो संत रविदास के जन्म की प्रामाणिक तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं लेकिन अधिकतर विद्वान सन् 1398 में माघ शुक्ल पूर्णिमा को उनकी जन्म तिथि मानते हैं। कुछ विद्वान इस तिथि को सन् 1388 की तिथि बताते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर साल माघ पूर्णिमा को संत रविदास की जयंती मनाई जाती है। कहते हैं माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। रविदास चर्मकार कुल में पैदा हुए थे इस कारण आजीविका के लिये भी इन्होंने अपने पैतृक कार्य में ही मन लगाया। ये जूते इतनी इतनी लगन और मेहनत से बनाते मानों स्वयं ईश्वर के लिये बना रहे हों। उस दौर के संतों की खास बात यही थी कि वे घर बार और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बिना ही सहज भक्ति की और अग्रसर हुए और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए ही भक्ति का मार्ग अपनाया।
सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा में पधारे वृन्दावन से प्रख्यात कथा वाचक
Pranjal Gupta 2020-02-07 17:19:11
पीलीभीत, 7 फरवरी 2020, (आरएनआई )। यूपी के पीलीभीत जिले में शहर की गोदावरी कालोनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में बृन्दावन से पधारे प्रख्यात कथा वाचक परमादरणीय सुधीर कृष्ण उपाध्याय ने दिव्य भाव प्रकट किए। जिसमे बताया कि मानव का कल्याण मात्र भागवत के श्रवण से है। श्रीमद्भागवत कथा एक ऐसा वृक्ष है जिसकी छाया में आप पूर्ण मनोयोग से भजन चिंतन श्रावन करे तो संसार रूपी भव से तो पार होंगे ही अपितु भगवान की अलौकिक लीला के दर्शन भी प्राप्त होते है। ऐसे कितने भक्तो के प्रसंग है जो इस संसार मे आज भी भक्ति से भगवान से साक्षात्कार करते है और उनकी कृपा रूपी छाया का दर्शन करते है।""।।दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोई।।
सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार
Shyam Chandra Srivastav 2020-02-04 12:44:39
सुल्तानपुर, 4 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विकासखंड धनपतगंज के खुनका बहादुरपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण जी का प्राकट्य उत्सव हुआ।भव्य झांकी और मंगलगीत के साथ सुंदर भजनों से पूरा माहौल भक्ति मय हो गया। संगीतमयी कथा रूपी गंगा में भगतप्रेमी श्रोताओं ने अवगाहन स्नान किया।गौरतलब है कि आदि गंगा गोमती के तट पर बसे सुरम्य गांव खुनका में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है।कथाव्यास पं.आनंदशास्त्री जी के श्रीमुख से सोमवार को सुखदेव द्वारा राजा परीक्षित की जिज्ञासा को उत्तम तरीके से शांति प्रसंग और भक्ति अजामिल की कथा का वर्णन किया गया। आकाशवाणी सुनकर आततायी कंस ने बहनोई बासुदेव और बहन देवकी को कारागार में बंद कर दिया,और नववें पुत्र से अपना बध होने के डर से सभी नवजात शिशुओं की हत्या करने का भी पाप किया ।श्री शास्त्री जी बताया कि कर्मो का फल मिलना निश्चित है।धरा को पापमुक्त करने के लिए भादों कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधीरात प्रभु को अवतरित होना पड़ा।प्रभु की लीला का बखान करते हुए कथाव्यास ने कहा कि बासुदेव ने उफनाई यमुना जी को पार कर नंद जी के घर शिशु रूपी प्रभु को पहुँचाया। इधर नंद जी के घर लाला होने की खबर पूरे गोकुल में तेजी से फैल गई।दशो दिशाओं में बधाई एवं मंगलगीत होने लगे। कथा प्रसंग के दौरान आयोजक ध्रुव नारायण तिवारी सपत्नीक भगवान को माखन मिश्री का भोग लगया और आरती उतारी। भव्य झांकी देखकर और भजनों पर श्रोता गण थिरकने हुए खुशिया मनाई।एक दूसरे को बधाई दी।
संसार अपने स्वार्थ में करता है प्रेम : जगतगुरु
Rupesh Kumar 2020-02-03 20:07:33
मुजफ्फरपुर/बंदरा, 3 फरवरी 2020, (आरएनआई )। भगवान तब प्रेम करते है, जब हमारे पास कुछ नही रह जाता है. संसार तो अपने स्वार्थ के लिए प्रेम करता है।केवल भगवान का संबंध ही सास्वत है, संसार में संबंध नही अनुबंध होते है। जब तक हम ईश्वर से संबंध नही बनाएंगे तब तक ईश्वर को प्राप्त नही कर सकते है। अपने जीवन मे कोई भी प्राणी कितना भी पढ़-लिख कर ज्ञान प्राप्त करले, जब तक जीवन मे सीताराम के चरणों की भक्ति नही मिलती तब तक जीवन मे शांति की प्राप्ति नही हो सकती। उक्त बातें जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी महाराज ने मतलुपुर के बाबा खगेश्वरनाथ मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान कही.
अपने मन, कर्म और वचन से संकल्पित होकर लें सर्व जन की सेवा व सहयोग की साधना : गरिमा
Rupesh Kumar 2020-01-30 16:09:05
बेतिया, 30 जनवरी 2020, (आरएनआई )। नप सभापति गरिमा देवी सिकारिया ने अपने गृह वार्ड 24 में बनी माँ सरस्वती की प्रतिमा का गुरुवार को समारोह पूर्वक पूजन किया। इसके मौके पर पहुंचे श्रद्धालु महिला-पुरुषों से उन्होंने कहा कि विद्या की देवी मां सरस्वती उपासना के दिन आज हमें अपने मन, कर्म और वचन से संकल्पित होना है कि हमारा जीवन जन जन की सेवा व सहयोग की साधना बन जाय। तभी हमारा ज्ञान और हमारी विद्या सार्थक होगी। उन्होंने बताया कि आज माघ शुक्ल पंचमी तिथि को शास्त्रों में 'बसंत पंचमी' कहा गया है। इसे श्रीपंचमी और माँ सरस्वती के प्रकट होने का दिवस भी कहा और माना जाता है। इसी को लेकर हम बसन्त पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा उपासना करते आ रहे हैं। शास्त्रवत विधि विधान से विद्या व बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी की पूजा करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इस पूजन समारोह में वीणा केयाल, आभा देवी, सुशीला चतुर्वेदी, नितिन वर्णवाल, अनुराग चतुर्वेदी, ममता, निभा देवी, कांति देवी, नवेन्दु चतुर्वेदी आदि की सक्रिय सहभागिता रही.(रिपोर्ट-घनश्याम)
देश में मां शारदा का इकलौता मंदिर यहां आज भी आते हैं आल्हा और उदल
Rupesh Kumar 2020-01-29 20:12:53
सतना, 29 जनवरी 2020, (आरएनआई )। मध्य प्रदेश के सतना जिले में पर्वत की चोटी के बीच में ही शारदा माता का मंदिर है। भक्त यहां 1063 सीढ़ियां लांघ कर माता के दर्शन करने जाते हैं। पूरे भारत में सतना का मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है। मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर भी कहा जाता है। यहां माता के साथ देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, श्री काल भैरवी, भगवान, फूलमति माता, ब्रह्म देव, हनुमान जी और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।अल्हा और उदल शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। आल्हा और उदल वही हैं जिन्होनें पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था। ऐसा कहा जाता है कि इन दोनों के द्वारा ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के मंदिर की खोज की गई थी। फिर आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आज भी यह मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है। तालाब से 2 किलोमीटर आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में ये मान्यता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे। मंदिर के पीछे वाले तालाब को आल्हा तालाब कहा जाता है।माना जाता है कि राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री सती शिव से विवाह करना चाहती थी। लेकिन राजा दक्ष को ये मंजूर नहीं था। शिव के बारे में उनकी धारणा थी कि वे भूतों और अघोरियों के साथी हैं। लेकिन सती नहीं मानी और उन्होंने अपनी जि़द पर भगवान शिव से विवाह कर लिया। बाद में राजा दक्ष ने एक यज्ञ करवाया। जिसमें शामिल होने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को बुलाया गया पर जान-बूझकर भगवान शंकर को इससे दूर रखा गया और वो नहीं आ पाए। दक्ष की पुत्री और शंकर जी की पत्नी सती इससे बहुत आहत हुईं।जब दक्ष द्वारा शिव को नहीं बुलाया गया तो यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता से शंकर जी को आमंत्रित नहीं करने का कारण पूछा। इस पर दक्ष द्वारा भगवान शंकर को अपशब्द कहा गया। ये बात सती को अपमानित लगी और उन्होंने दुखी होकर यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी। जब भगवान शंकर को इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका त्रिनेत्र खुल गया।फिर गुस्से में शिव ने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और तांडव करने लगे। जिसके बाद ब्रह्मांड पर खतरा मंडराने लगा और फिर सृष्टि की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 52 भागों में बांट दिया। जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों बन गए। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिवजी को फिर से पति रूप में प्राप्त हो गई। ऐसी मान्यता है कि यहीं माता का हार गिरा था। हालांकि, सतना का ये मैहर मंदिर शक्ति पीठ तो नहीं है। लेकिन लोगों की आस्था इस कदर है कि यहां सालों से माता के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है।माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी। मूर्ति पर देवनागरी लिपि में शिलालेख भी अंकित है।जहां बताया गया है कि सरस्वती के पुत्र दामोदर ही कलियुग के व्यास मुनि कहे जाएंगे। दुनिया के जाने-माने इतिहासकार ए कनिंग्घम ने इस मंदिर पर विस्तार से शोध किया है। इस मंदिर में पुराने समय से ही बलि देने की प्रथा है। लेकिन 1922 में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने पशु बलि को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया. मंदिर के पास से ही येलजी नदी बहती है.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
ରଟନ୍ତି କାଳୀପୂଜାରେ ଝଲସୁଛି ଅସୁରାଳି
Laxmikanta Nath 2020-01-28 20:09:14
ଭଦ୍ରକ : ଭଦ୍ରକ ଜିଲା ଧାମନଗର ବ୍ଲକ ଅସୁରାଳିରେ ଶନିବାର ରାତିରୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଛି ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀପୂଜା। ଏଥିପାଇଁ ଅସୁରାଳି ଉତ୍ସବମୁଖର ହୋଇଥିବାବେଳେ ବିଭିନ୍ନ ସାଜସଜ୍ଜା ଓ ରଙ୍ଗିନ ଆଲୋକମାଳାରେ ଝଲସୁଛି। ବିଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁମାନେ ଆସି ମା’ଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରୁଛନ୍ତି। ଅସୁରାଳି, ଫତେପୁର, ଗୋବିନ୍ଦପୁର, କଲ୍ୟାଣୀ ଓ କୋଠାର ଆଦି ପଞ୍ଚାୟତବାସୀଙ୍କ ସହଯୋଗରେ ଏହି ସାର୍ବଜନୀନ ପୂଜା ପାଳିତ ହୋଇଆସୁଛି। ଅସୁରାଳି ବଜାର ବଣିକ ସଂଘ ଏବଂ ପୂଜା କମିଟି ଆନୁକୂଲ୍ୟରେ ଚଳିତବର୍ଷ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଧୁମ୍‌ଧାମ୍‌ରେ ପାଳନ ହେଉଛି। ପ୍ରତିଦିନ ଚଣ୍ଡୀପାଠ, ଦେବୀ ବଗଳାମୁଖୀଙ୍କ ଆବିର୍ଭାବ, ଦିନବେଳା ଖିଚୁଡ଼ି ପ୍ରସାଦ ବଣ୍ଟନ ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟହ ସନ୍ଧ୍ୟା ଆଳତି ମୁଖ୍ୟ ଆକର୍ଷଣ ସାଜିଛି। ଏହି ସମୟରେ ଆଳତି ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ହଜାର ହଜାର ଭକ୍ତଙ୍କ ସମାଗମ ହେଉଛି। ସେହିପରି ସନ୍ଧ୍ୟାରେ ପ୍ରବଚନ, ଭଜନସନ୍ଧ୍ୟା, ବିଦ୍ୟାଳୟ ସ୍ତରୀୟ ପ୍ରତିଯୋଗିତା, ନୃତ୍ୟ ସଙ୍ଗୀତ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ସହିତ ଅପେରା ପ୍ରଦର୍ଶନ ବ୍ୟବସ୍ଥା ହୋଇଥିବା କମିଟି ସଭାପତି ଡା. ସଦାନନ୍ଦ ଦାସ, ଉପସଭାପତି ହରିହର ବେହେରା, ସମ୍ପାଦକ ଅଜୟ ସ୍ବାଇଁ ଓ ସହସମ୍ପାଦକ ଅମୂଲ୍ୟ ବେହେରା ସୂଚନା ଦେଇଛନ୍ତି। ଆସନ୍ତା ୪ ତାରିଖରେ ଭସାଣି ଅନୁଷ୍ଠିତ ହେବ ବୋଲି କମିଟି ପକ୍ଷରୁ କୁହାଯାଇଛି। ଉଲ୍ଲେଖନୀୟ ଯେ, ଅସୁରାଳିର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦେବୀ ଆଶ୍ରମର ପ୍ରତିଷ୍ଠାତା ସ୍ବର୍ଗତ ବାବା ବୈରାଗୀ ପିଲାଦିନରୁ ମା’ ବିରଜାଙ୍କ ବଡ଼ ଭକ୍ତ ଥିଲେ। ମା’ ବିରଜାଙ୍କ ପୀଠରେ ଦିନେ ସ୍ବପ୍ନରେ ବାବା ଭୈରବାନନ୍ଦଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରି ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କୁ ପୂଜା ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ପାଇଥିଲେ। ହିମାଳୟର ନନ୍ଦନ ଯାଇ ବାବା ଭୈରବାନନ୍ଦଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରି ତାଙ୍କର ଶିଷ୍ୟତ୍ୱ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ। ତାଙ୍କଠାରୁ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କ ବିଷୟରେ ଅବଗତ ହୋଇ ସେଠାରୁ ଫେରି ଅସୁରାଳିରେ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲେ। ପୌରାଣିକ ମତରେ ପାତାଳପୁରର ମହିରାବଣ ଏବଂ ଅହିରାବଣ ଦେବୀ ନିକୁମ୍ଭିଲାଙ୍କୁ ପୂଜାର୍ଚ୍ଚନା କରି ବଳି ପ୍ରଥା ପ୍ରଚଳନ କରିଥିଲେ। ରାବଣଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ରାମ ଏବଂ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କୁ ହତ୍ୟା ପାଇଁ ଉଦ୍ୟମ ସମୟରେ ହନୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦୁଇଭାଇ ବଧ ହୋଇଥିଲେ। ଏହାପରେ ପ୍ରଭୁ ରାମଚନ୍ଦ୍ର ଦେବୀ ନିକୁମ୍ଭିଲାଙ୍କୁ ପାତାଳପୁରରୁ ଉଦ୍ଧାର କରି ଉତ୍ତର ଓ ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀ ରୂପରେ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରାଇଥିଲେ। ସାଧାରଣତଃ ମା’ କାଳୀଙ୍କ ମୃଣ୍ମୟୀ ମୂର୍ତ୍ତି ଶିବଙ୍କ ଛାତି ଉପରେ ବାମପାଦ ରଖିଥିବାବେଳେ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଶିବଙ୍କ ଉପରେ ମା’ଙ୍କର ଦକ୍ଷିଣ ପାଦ ସ୍ଥାପନର ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଆସିଛି। ବାବା ବୈରାଗୀ ୧୯୫୨ରେ ମାଘ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶୀରେ ଅସୁରାଳିର ଗାନ୍ଧୀ କୁଟିରରେ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରି ଏହାକୁ ସାର୍ବଜନୀନ କରିଥିଲେ। ପ୍ରଥମେ କାଠ ଘେରା ମଣ୍ଡପରେ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା। ଏବେ ବିଶାଳ ପୂଜା ମଣ୍ଡପ, ସ୍ଥାୟୀ ଯାତ୍ରା ମଣ୍ଡପ ଓ ମନ୍ଦିର ପରିସର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଢଳେଇ ଦାଣ୍ଡ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଛି। ପୂଜା ପାଇଁ ଦୈନିକ ହଜାର ହଜାର ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁଙ୍କ ଭିଡ଼ ଜମୁଛି।
बिहार का एक ऐसा मंदिर जहां भक्तों को देना पड़ता है धरना, माता पूरी करते हैं मुरादे
Rupesh Kumar 2020-01-28 13:13:26
पटना, 28 जनवरी 2020, (आरएनआई )। हमारे देश में कई मंदिरें है, जिनकी अलग-अलग मान्यताएं हैं। आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां 30 दिनों तक धरना देने पर हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। यह मंदिर बिहार के जमुई में है। यह मंदिर जमुई रेलवे स्टेशन के ठीक सामने ( मलयपुर ) है। इस मंदिर को जमुई का गौरव माना जाता है। इस काली मंदिर को मां नेतुला मंदिर ( Maa netula mandir jamui ) के नाम से जाना जाता है।इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि मां नेतुला ( mata netula ) के दरबार में आने वाले लोगों का नेत्र से संबंधित विकार दूर होता है। यही कारण है कि जमुई काली मंदिर में सालों भर नेत्र रोग से परेशान पुरूष और महिला श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे भक्तिभाव से 30 दिनों तक धरना देने पर मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)

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