नीम के आयुर्वेदिक गुण और नुकसान

Shyam Singh Chandel 2019-01-22 21:29:46    HELTH 9707
नीम के आयुर्वेदिक गुण और नुकसान
मथुरा, 22 जनवरी (आरएनआई) नीम के आयुर्वेदिक गुण और नुकसान को इन क्रमो मे रखा जा सकता हैः-

1. नीम के आयुर्वेदिक गुण

2. नीम के फायदे व औषधीय प्रयोग

3. नीम के नुकसान

4. नीम की आयुर्वेदिक औषधियां



नीम के आयुर्वेदिक गुण :

1. नीम सुप्रसिद्ध सर्वविदित सर्वत्र पाया जाने वाला त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को दूर करने की अपार क्षमता से सुशोभित वृक्ष है ।

2. पुराणों में इसे अमृत तुल्य माना गया है।

3. नीम वृक्ष का पान्चांग (फल, फूल, पत्ते, जड़ और छाल) का रेशा-रेशा अर्थात् जड़ से शिखर तक वृक्ष औषधीय गुणों से भरपूर है । यही इसके विशेष महत्त्व की बात है, ऐसा बहुत कम वृक्षों के साथ महत्व जुड़ा हुआ है ।

4. इसकी कोपलें नेत्र रोग, गर्मी, कोढ़ और कफ नाशक होते हैं । इसके पत्ते कृमि, विष, अरूचि और अजीर्ण नाशक होते हैं ।

5. इसके सूखे हुए पत्ते मनुष्य और कपड़ों (दोनों) की रक्षा करते हैं तथा अनाज में रखने से उसे भी घुनने (कृमियों) से बचाते हैं।

6. इस वृक्ष के फल (निबौली) बबासीर, प्रमेह, कोढ़, कृमि और गुल्म को शान्त करते हैं। 7. इसके पके फल (निबौली) रक्त, पित्त, कफ, नेत्र रोग, दमा नाशक है ।

8. इस वृक्ष का फूल (निबौली का फूल) कफ और कृमि नाशक है ।

9. इस वृक्ष का डन्ठल खाँसी, बबासीर, प्रमेह और कृमिजन्य विकार नाशक गुणों से भरपूर है ।

10. निबौली की गिरी कोढ़ में विशेष रूप से आरोग्यता प्रदान करने वाली है ।

11. नीम (निबौली) का तैल कृमि, कोढ़ और त्वचा रोग नाशक और दांत, मस्तक, स्नायु और छाती के दर्द को मिटाने के गुणों से भरपूर है।

12. नीम मूत्रल है यौनांगों को विकार मुक्त करके पुष्ट और सबल बनाता है। यह चेतना सर्जक है और दिमागी ताकत का असीम भंडार है ।

13. यह स्त्रियों के मासिक धर्म को नियमित भी करता है ।



नीम के फायदे औषधीय प्रयोग



1- अजीर्ण- नीम की निबौली खाने से अजीर्ण नष्ट हो जाता है । इसके सेवन से मल निष्कासित होकर रक्त स्वच्छ हो जाता है। रक्त संचार तीव्रता से होने के कारण जठराग्नि तीव्र हो जाती है । परिणामस्वरूप क्षुधा बढ़ जाती है ।



2- सुन्नपन- शरीर अथवा शरीर का कोई अंग विशेष यदि सुन्न हो गया हो तो नियमित 3-4 सप्ताह के नीम तैल की मालिश से सुन्न नसों में पूर्ण रूपेण चेतना आकर सुन्नपन नष्ट हो जाता है। नीम के बीजों का तैल निकलवाकर मालिश करें ।



3- अफीम खाने की लत- नीम पत्तियों का रस 1-1 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से अफीम खाने की लत में कमी आकर धीरे-धीरे छूट जाती है । यदि अफीम खाने की लत अधिक सताये तो भांग का अल्प मात्रा में सेवन कर लिया करें । अफीम के मुकाबले भांग कम हानिकारक है तथा इसका सेवन कभी भी छोड़ा जा सकता है ।



4- अरुचि- अरुचि खाने-पीने की हो अथवा काम धन्धे की, नीम के सूखे पत्तों का चूर्ण बनाकर 1-1 चुटकी प्रत्येक 2-2 घंटे पर दिन में 3-4 बार सेवन करने से नष्ट हो जाती है । इस हेतु नीम की कोपलें भूनकर भी खाई जा सकती है ।



5- हर्निया- अन्डवृद्धि (हर्निया) में नीम, हुरहुर की पत्तियाँ और अमरबेल सभी सममात्रा में लेकर गोमूत्र में घोट-पीसकर अन्डकोषों पर लेप करते रहना अत्यन्त उपयोगी है।



6- आँखे दुखने पर-नीम की पत्तियों का रस 1-1 बूंद आँखों में डालें । नोट –बच्चों की दुखती आंखों में न डालकर कानों में डालें तथा यदि 1 आँख दुख रही हो तो विपरीत कान (बांयी आँख पर दुखने पर दांये कान में डालें ।



7- आँखों की जलन- नीम की पत्तियों का रस और पठानी लोध (10-10 ग्राम पीसकर आँखों की पलकों पर लेप करने से आँखों की जलन और लालिमा नष्ट हो जाती है



8- आँखों में सूजन- होने पर 10 ग्राम नीम की पत्तियाँ उबालकर 5 ग्राम फिटकरी में घोलकर दिन में तीन बार करना लाभप्रद है।



9- आग से जल जाने पर- नीम तैल लगाना उपयोगी है। नीम की 50 ग्राम कोंपले तोड़कर 250 ग्राम खौलते तैल में इतना पकायें कि नीम की कोपलें जल जायें (किन्तु जलकर राख न हों) तदुपरान्त 1-2 बार छानकर सुरक्षित रखलें और लगायें ।



11- नीम का मरहम- 250 ग्राम नीम के तैल में 125 ग्राम वैक्स (मोम), नीम की हरी पत्तियों का रस 1 किलो, नीम की जड़ की छाल का चूरा 50 ग्राम और नीम की पत्तियों की राख 25 ग्राम डालें । तैल और नीम का रस हल्की आग पर इतना पकायें कि तैल आधा या इससे भी कम रह जाए। फिर इसी में मोम डाल दें । जब तैल और मोम एकजान हो जाए तो छाल का चूरा और पत्तियों की राख भी मिला दें । यह प्रत्येक प्रकार का घाव भरने हेतु रामबाण मरहम तैयार हो गया।



12- पड़वाल- नीम की हरी पत्तियां, भीमसैनी कपूर, जस्ता भस्म, लाल चन्दन का बुरादा 10-10 ग्राम और शुद्ध रांगा 50 ग्राम को किसी लोहे के पात्र (कड़ाही) में खूब घोटकर सुरमा बनाकर आंखों में लगाने से पड़वाल (आंखों के बालों का आंखों के अन्दर की ओर जाना) जड़मूल से नष्ट हो जाता है।



13- उपदंश- आतशक(उपदंश) में नीम की पत्तियों का रस 10 ग्राम अथवा नीम का तैल 5 ग्राम नित्य पियें और यौनांगों पर नीम तैल की मालिश करें । अति उपयोगी योग है।



14- आधासीसी- नीम की पत्तियाँ, काली मिर्च और चावल 25-25 ग्राम घोट पीसकर नसवार बनालें । सूरज निकलने से पूर्व ही 1-1 चुटकी यह नसवार लेकर नथुनों से ऊपर खींचें । मात्र 1 सप्ताह के नित्य प्रयोग से पुराने से पुराना आधासीसी का रोग जड़ से भाग जाएगा ।



15- आँव आने पर – नीम पत्तियों का आधा कप काढा अथवा पत्ती का 2 या ढाई ग्राम चूर्ण या पत्ती का दस ग्राम रस या छाल का चूर्ण डेढ़ से दो ग्राम तक अथवा फल, फूल छाल, डन्ठल और पत्ती अर्थात् पंचांग का चूर्ण हो तो मात्र दो ग्राम सेवन करने से लाभ हो जाता है ।



16- वमन- 20 ग्राम नीम की पत्तियाँ पीसकर आधा कप पानी में घोलकर 5 दाने काली मिर्च के भी मिलालें । इसे पीने से किसी भी कारण से उल्टियां (वमन या कै) आ रही हो, शर्तिया शान्त हो जाती हैं ।

17- एक्जिमा- नीम की छाल, मजीठ, पीपल की छाल, नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय प्रत्येक 10-10 ग्राम लेकर काढ़ा बनाकर आधा-आधा कप सुबह-शाम पीने से एक्जिमा नष्ट हो जाता है।



18- दो किलो नीम पत्ती का रस, 500 मि.ली. सरसों का तैल, आक का दूध, लाल कनेर की जड़ और काली मिर्च 5-5 ग्राम लेकर हल्की आग पर पकाकर तैल मात्र शेष रहने पर छानकर सुरक्षित रखलें । इस तैल को लगाने से एक्जिमा समूल नष्ट हो जाता है तथा त्वचा पर कोई दाग शेष नहीं रहता है।



19- कब्ज- प्रात: (सूर्योदय से पूर्व) कुल्ला करके नीम की 10 ग्राम पत्तियाँ घोटकर पानी में मिलाकर पीने से कब्ज मिटकर पेट स्वच्छ हो जाता है ।



20- कण्ठमाला – महानिम्ब (बकायन) के पत्तों और छाल का काढ़ा पीने से और छाल की पुल्टिस बनाकर गले पर बांधने से कण्ठमाला रोग जड़ मूल से मिट जाता है



21- कनफोड़े- कच्ची निबौली को चबाने से कर्णमूल (कनफोड़े) ठीक हो जाते हैं अथवा नीम के बीजों को नीम के ही तैल में पकाकर इसमें फुलाया हुआ नीला थोथा पीसकर मरहम बनाकर लगायें ।

नोट-नीला थोथा जहर है अतः प्रयोग के बाद हाथ अवश्य साबुन से खूब भली-भांति घोकर स्वच्छ करलें ।



22- कनखजूरे के विष में- नीम की पत्तियाँ घोटकर सैंधा नमक मिलाकर लेप करने से (जहाँ कनखजूरे ने काटा हो वहाँ लेप करें) विष नष्ट हो जाता है



23- कानों के कीड़े – नीम पत्तियों का 25 ग्राम रस नमक मिलाकर गुनगुना करके कानों में टपकाने से कानों से समस्त कीड़े निकल जाते हैं । आवश्यकता पड़ने पर (कान में कीड़े होने पर) यह क्रिया दूसरे दिन भी की जा सकती है। ( और पढ़ें – कान में से कीड़े को निकालने के 22 घरेलु उपाय)



24- कानों का बहना- 50 ग्राम सरसों के तेल में 25-30 ग्राम नीम के पत्ते पकावें । (इसी में 5 ग्राम पिसी हल्दी डाल लें । तदुपरान्त इस तैल को छानकर 1 छोटा चम्मच शहद मिलाकर शीशी में सुरक्षित रखलें । इस तैल को 3-4 दिनों कान में टपकाने से कानों की बहना और दुर्गन्ध निकलना शर्तिया दूर हो जाता है । अथवा नीम के तैल में शहद मिलाकर रूई की बत्ती से कान में फेरने मात्र से ही पीव आना और दुर्गन्ध निकलना, दर्द होना मिट जाता है



25- कान सुन्न पड़ जाना – नीम पत्ती 1 का रस चम्मच पीने से तथा 2-2 बूंद कानों में डालने से कान सुन्न पड़ जाने का रोग दूर हो जाता है ।



26- सफेद कोढ़- नीम की फूल-पत्ती और निबौली पीसकर 40 दिन निरन्तर शर्बत बनाकर पीने से सफेद कोढ़ से मुक्ति मिल जाती है



27- गलित कोढ़- नीम का गोंद नीम के ही रस में ही पीस कर पीने से गलित कोढ़ नष्ट हो जाता है । कोढ़ (लेप्रोसी) से ग्रसित रोगी को नीम वृक्ष के नीचे ही रहने, खाने, पीने और नीम की पत्तियां बिछावन की भांति बिछाकर सोना अत्यन्त ही लाभप्रद है घावों पर नीम का तैल लगाना अथवा शरीर पर मालिश करना, नीम की पत्तियों का रस पीना अथवा नीम से झरने वाला मद (50 ग्राम) तक पीना हितकर है। नीम की पत्ती का रस पानी में मिलाकर स्नान करना तथा बिस्तर से हटायी गयी नीम पत्तियों को जलाकर (धूनी लगाने से) वातावरण स्वच्छ रहता है । जली हुई पत्तियों की राख नीम के तैल में मिलाकर घावों पर लगाना भी लाभकारी है ।



28- मच्छर भगाना – नीम की सूखी पत्तियों के ढेर में गन्धक चूर्ण डालकर आग लगाने से खटमल और मच्छर भाग जाते हैं।



29- गले में जलन- पेट की खराबी के कारण होने वाले गले की दाह में नीम के रस में निबौली घोटकर शर्बत की भांति पीना लाभप्रद है।



30- बलगमी खाँसी में – नीम के पत्तों की भस्म शहद में मिलाकर चाटना अत्यन्तु लाभकारी है । नीम भस्म को सौंठ, अजवायन, काली मिर्च, पुदीना एवं अदरक रस में घोटकर चाटने से तुरन्त लाभ होता है । इस प्रयोग से श्वास नली के समस्त अवरोध और दूषण शान्त हो जाते है । ( और पढ़ें –कफ दूर करने के सबसे कामयाब 35 घरेलु उपचार)



31- खून की खराबी- 30 ग्राम नीम की कोपलों का रस तीन दिन पीने से खून की खराबी दूर हो जाती है। ( और पढ़ें – खून की खराबी दूर करने के 12 घरेलु आयुर्वेदिक उपाय)



32- खुजली में – नीम और मेंहदी के पत्तों को एक साथ रगड़कर रस निकाल कर 25 ग्राम की मात्रा में पीना तथा शेष बचे रस को नारियल के तैल में भूनकर छानकर शरीर पर मलना लाभकारी है। अथवा नीम का पंचांग (बीज, फूल, फल और पत्ते तथा जड़) समान मात्रा में पीसकर 4 चम्मच सरसों के तैल में उक्त चूरा हल्की आग पर तपाकर (नीम ज़लने की गन्ध फैलते ही और धुंआ उठते हुए ही) उतारकर, छानकर साफ-स्वच्छ शीशी में सुरक्षित रखलें। इस तेल की मालिश से मात्र खुजली ही नहीं, वरन् त्वचा सम्बन्धी समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं ।



33- खूनी दस्त- पतझड़ के मौसम में नीम छाल को पीसकर छानकर दो ग्राम की मात्रा में 3-3 घंटे पर ताजे पानी से सेवन करने से खूनी दस्त रुक जाते हैं।



34- गंजापन- नीम तैल की निरन्तर काफी दिनों तक मालिश करते रहने से गंजापन नष्ट हो जाता है।



35- गठिया – 25 ग्राम सरसों के तैल को पकाकर (खूब खौलने तक पकायें) उसमें 10 ग्राम नीम की कोपलें डालकर काली पड़ने दें (जलने से पहले ही उतार लें) फिर इसवने छानकर तैल को पुनः गुनगुना करके गठिया से आक्रान्त अंगों पर मालिश करें तथा इसी तैल से शाक-भाजी बनाकर खायें । गठिया के लिए अक्सीर योग है। अथवा महानिम्ब (बकायन) के बीज को पीसकर दो ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करें । सुन्न पड़ गये अंगों को इस योग के सेवन करने से चैतन्यता मिलती है।



36- शरीर में गर्मी- नीम पत्तियों के रस में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से शरीर (देह) की गर्मी (शरीर में गर्मी का जोर) शान्त हो जाता है ।



37- गर्मी से बुखार होने पर- नीम की छाल, गिलोय, लाल चन्दन, धनिया और कुटकी सम मात्रा में लेकर जौकुट कर काढ़ा बनाकर 20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन (तीन दिन में तीनखुराके) ले इससे अधिक सेवन कदापि न करें। यह ‘गड्न्यादि क्वाथ’ कहलाता है । मात्र इतने सेवन से ही बुखार भाग जाता है। और प्यास भी शान्त हो जाती है । यह उपचार रक्त को ठण्डा करता है ।



38- गले की जलन- नीम की पत्तियों का रस निकालकर हल्का गर्म करके (इसमें 5-7 बँट शहद भी मिला सकते हैं) गरारें (कुल्ला) करने से गले की जलन शान्त हो जाती है तथा कफ को हटाने में तो यह योग लाभप्रद है ।



39- गिल्टियों और सूजन में-नीम की पत्तियों को दरड़ लें (बारीक न पीसे) और नमक डालकर कड़वे तैल में पकायें, इसमें एक चुटकी पिसी हल्दी मिलाकर पुल्टिस तैयार कर किसी कपड़े में पोटली बनाकर गिल्टियों और सूजन पर हल्कीहल्की टकोर (सेंक) करें । दो दिन में ही आराम मिलने लगेगा ।।

नोट–टकोर करने पर पहले तो सूजन बढती हुई लगेगी, ऐसा खून संचार की क्रिया के कारण होता है । मगर बाद में शर्तिया लाभ होगा। अत: घबरायें नहीं और प्रयोग जारी रखें।



40- जोड़ों में दर्द –महानीम (बकायन) के पत्तों का रस पानी में मिलाकर पीने और जड़ की छाल को पीसकर लेप करने से गृधसी रोग (कमर से निचले जोड़ों में दर्द और जकड़न) नष्ट हो जाता है ।



41- घमौरियाँ- नीमरस में जरा सा नमक (सम्भव हो तो पांचों पिसे हुए नमक) मिलाकर दिन में 4 बार पीते रहने से घमौरियाँ नष्ट हो जाती हैं तथा गर्मी, खुश्की नहीं होती है और पित्ती भी नहीं निकलती है।



42- पित्ती – नीम के तैल में कपूर की टिकिया घोलकर ठण्डी हवा और छांव में बैठकर (धूप के असर से होने वाली पित्ती निकलने पर) मालिश करना तथा आधा घंटे के पश्चात् स्नान करना अत्यधिक लाभप्रद है ।



43- घाव- नीम की पत्तियों का रस और सरसों का तैल 10-10 ग्राम लेकर आग पर इतना पकायें कि रस जल जाए, तेल मात्र शेष रहे । इस तैल को घाव पर लगाना इतना अधिक गुणकारी है कि ऐलोपैथी की कीमती से कीमती घाव भरने का आयन्टमैन्ट (मलहम) इसका मुकाबला नहीं कर सकता है।



44- सोरायसिस- 40 दिनों तक निरन्तर नीम क्वाथ पीने से और त्वचा पर नीम का तेल लगाते रहने से चम्बल रोग (सोरायसिस) जड़ से नष्ट हो जाता है ।



45- त्वचा रोग – बहार के मौसम में प्रतिदिन नीम की 5 कोपलें चबाते रहने से अथवा 1 हफ्ता तक बेसन की रोटी में नीम की कोपले कुतरकर मिला दें तथा घी में खूब तर करके खाने से 1 साल तक त्वचा रोगों से बचाव हो जाता है ।



46- चेचक रोग- नीम की 7 लाल पत्तियाँ और 7 काली मिर्च के दाने प्रतिदिन चबाने से अथवा नीम और बहेड़े के बीज तथा हल्दी 5-5 ग्राम पीसकर ताजा पानी में घोलकर 1 सप्ताह पीने से 1 साल तक चेचक रोग से बचाव हो जाता है ।



47- बुखार- हरड़, बहेड़ा, आँवला का छिलका, सौंठ, पीपल, अजवायन, सैंधा और काला नमक प्रत्येक 10-10 ग्राम, काली मिर्च 1 ग्राम नीम के पत्ते आधा किलो और जौ क्षार 20 ग्राम को कूट पीस छानकर सुरक्षित रखलें । 3 से 5 ग्राम की मात्रा में फेंकी मारकर गुनगुने पानी के साथ पीने से चौथैया बुखार तो भाग ही जाता है इसका सेवन प्रत्येक प्रकार की ज्वरों में भी उपयोगी है ।



48- जलोदर रोग- सुबह-सुबह नीम की छाल का रस निकालकर 25 ग्राम की मात्रा में पीने के दो घंटे बाद घी की चूरी (परांठे की चूरी बनाकर घी में सानकर) 1 सप्ताह तक निरन्तर खाने (पानी न पियें अथवा कम से कम पियें) से जलोदर रोग नष्ट हो जाता है ।



49- कील मुँहासे- जवानी के कील मुँहासे मुरझाकर दाग छोड़ गए हों तो नीम के बीज सिरके में पीसकर 5-7 दिन दागों पर लेप करने से लाभ हो जाता है ।



50- जहरवा- नीम का मद (गोंद) दो ग्राम प्रतिदिन खाने से जहरवाद नष्ट हो जाता है।



51- जुएं- नीम का तैल सिर में मालिश करने से जुएं लीखें नष्ट हो जाती है ।



नीम के नुकसान :



1. सामान्य खुराक (मात्रा) में नीम के उपयोग से दुष्प्रभाव नहीं होते हैं।

2. नवजात शिशुओं को नीम का सेवन नहीं कराना चाहिये |

3. गर्भावस्था में महिलायें नीम का सेवन वैद्यकीय सलाहानुसार करें |






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थायराइड की समस्या से निजात पाने के उपाय
Shyam Singh Chandel 2019-01-06 10:59:01
मथुरा, 6 जनवरी (आरएनआई) थायराइड एक एसा रोग है जिसमें लक्षण शुरूआत में दिखाई नहीं देते हैं। यह थायरॉयड ग्रंथि का आम विकार है। थायराइड हार्मोंन शरीर के पाचन तन्त्र तथा शरीर के लगभग हर अंग प्रणाली के विनियमित को प्रभावित करता है। इस रोग मे शरीर के अंग तेज या धीमी गति से काम करते हैं। इसमें शरीर की ऑक्‍सीजन की खपत और हीट के उत्‍पादन को विनियमित करता है।
सेहतमन्द कैसे बने रह सकते हैं?
Shyam Singh Chandel 2019-01-06 09:58:10
मथुरा, 6 जनवरी (आरएनआई) सेहतमन्द कैसे बने रह सकते हैं?
जानिये मिजिल्स रूबेला टीकाकरण आखिर क्या है..? क्या है इसके लक्षण, क्या हैं इसके उपाय आइये बताते हैं आपको...
Rama Shanker Prasad 2018-12-25 08:55:33
आरा, 25 दिसंबर (आरएनआई)। रूबेला एक संक्रमण से होने वाली बीमारी है जो जीनस रुबिवायरस के वायरस द्वारा होता है। रुबेला संक्रामक है लेकिन प्राय: हल्का वायरल संक्रमण होता है। हालांकि रुबेला को कभी-कभी “जर्मन खसरा” भी कहते हैं, रुबेला वायरस का खसरा वायरस से कोई संबंधित नहीं है।
डेंगू के प्रकोप से बचाव के उपाय
Shyam Singh Chandel 2018-09-24 22:18:16
मथुरा, 24 सितम्बर (आरएनआई) डेंगू के प्रकोप से बचाव के उपाय1. डेंगू के लिए घरेलू नुस्खेडेंगू का प्राकोप आजकल बहुत तेजी से फैल रहा है। यह बीमारी एडीज मच्छर द्वारा काटने से होती है। डेंगू के बारे में सबसे खास बात यह है कि इसके मच्छर दिन के समय काटते हैं तथा यह मच्छर साफ पानी में पनपते हैं। डेंगू के दौरान रोगी के जोड़ों और सिर में तेज दर्द होता है और बड़ों के मुकाबले यह बच्चों में ज्यादा तेजी फैलती है। डेंगू बुखार में प्लेटलेट्स का स्तर बहुत तेजी से नीचे गिरने के कारण यदि इसका इलाज तुरंत न किया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है। डेंगू से बचाव के लिए कुछ घरेलू उपाय भी हैं जिन्हें अपनाकर डेंगू से बचाव संभव है। हम आपको कुछ ऐसे ही घरेलू और प्राकृतिक नुस्खे बता रहे हैं ताकि आप खुद को डेंगू के प्रकोप से बचा सकें।
कपालभाति प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्राणायाम है
Shyam Singh Chandel 2018-09-23 23:45:19
मथुरा, 23 सितम्बर (आरएनआई) कपालभाति, प्राणायाम के विभिन्न प्रकारों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्राणायाम है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण ये है कि श्वास को स्वत: ही आने दे उसमें कर्ता भाव न लाएं क्योंकि श्वास को बाहर फेंकते समय नाभि से श्वास स्वत: ही उठ जाती है।कपालभाति का अर्थ‘कपाल’ का अर्थ है खोपड़ी (सिर) तथा भाति का अर्थ है चमकना। चूंकि इस क्रिया से सिर चमकदार बनता है अतः इसे कपालभाति कहते हैं। कपालभाति एक ऐसी सांस की प्रक्रिया है जो सिर तथा मस्तिष्क की क्रियाओं को नई जान प्रदान करता है। घेरंडसंहिता में इसे भालभाति कहा गया है, भाल और कपाल का अर्थ है ‘खोपड़ी’ अथवा माथा। भाति का अर्थ है प्रकाश अथवा तेज, इसे ‘ज्ञान की प्राप्ति’ भी कहते हैं।
उक्त रक्तचाप का उपचार व उपाय
Shyam Singh Chandel 2018-09-23 23:24:34
मथुरा, 23 सितम्बर (आरएनआई) रक्तचाप जिसे हाईपरटेंशन भी कहते हैं एक बहुत ही गंभीर और भयंकर रोग है क्योंकि अगर रोगी को सही समय पर सही चिकित्सीय मदद नहीं मिलती तो इससे हार्ट अटैक, ब्रेन हैंमरेज, वगैरह भी होने की संभावना रहती है।उच्च-रक्तचाप वह रोग है जिसमें हृदय के संकुचन की अवस्था में रक्त वाहिकाओं में रक्त का दबाव पारे के 140 mm से ज्यादा या हृदय के विस्तारण की अवस्था में 90 mm से ज्यादा रहता है या दोनों अवस्थाओं में ज्यादा रहता है। इसकी वजह है शारीरिक गतिविधियों की कमी। मोटापा, तनाव, खाने पीने में लापरवाही, गंभीर बीमारियाँ, अनुवांशिक बीमारियाँ, धूम्रपान, नशा वगैरह वगैरह।उच्च रक्तचाप के मुख्य कारणों में से एक है आपके रक्त का गाढ़ा होना। रक्त गाढ़ा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है। जिससे नसों और धमनियों पर दबाव पड़ता है। लहसुन में बहुत हीं ताकतवर एंटीओक्सीडेनट्स , जैसे कि सेलेनियम, विटामिन सी और एलीसीन होते है, जो कि रक्त को पतला करने में काफी प्रभावशाली होते हैं। इसीलिए सुबह सुबह कच्चे लहसुन के दो तीन कली के टुकड़े चबाने से या उसके महीन टुकड़े करके निगलने से काफी फायदा पहुँचता है।नमक ब्लड प्रेशर बढाने वाला प्रमुख कारक है, इसलिए हाई ब्लड प्रेशर वालों को नमक का प्रयोग कम करना चाहिए।
यूं दिखें 30 से ज्यादा की उम्र में भी जवां
ADMIN 2018-06-09 14:03:29
नई दिल्ली, 09 जून (आरएनआई) | जैसे जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे उम्र के साथ समस्यायें उत्पन्न होने लगती है , जैसे- चेहरे पर महीन रेखाएं, झुर्रियां, त्वचा का रंग काला पड़ते जाने से छुटकारा और त्वचा में कसाव बनाए रखने के लिए 30 साल की उम्र के बाद इसकी सही देखभाल बेहद जरूरी है।
Five practices that may add extra years to your life
ADMIN 2018-05-01 09:18:15
New Delhi, 1 May (RNI) | A study claims that eating a healthy diet, exercising regularly, keeping a healthy body weight, not drinking too much alcohol, and not smoking during adulthood may add over a decade to the life expectancy of a person.Researchers led by Harvard T H Chan School of Public Health also found that US women and men who maintained the healthiest lifestyles were 82 percent less likely to die from cardiovascular disease and 65 percent less likely to die from cancer when compared with those with the least healthy lifestyles over the course of the roughly 30-year study period.The study published in the journal Circulation is the first comprehensive analysis of the impact of adopting low-risk lifestyle factors on life expectancy in the US.
गर्मी में झुलसी त्वचा की यूं करें देखभाल
ADMIN 2018-04-16 15:14:49
नई दिल्ली, 16 अप्रैल (आरएनआई) | गर्मियों के मौसम में चिलचिलाती धूप तथा यूवी रेडिएशन की वजह से त्वचा में नमी कम हो जाती है, जिस वजह से त्वचा रूखी, मुरझाई तथा बेजान हो जाती है और त्वचा का रंग सामान्य से ज्यादा गहरा या काला हो जाता है। इस मौसम में त्वचा की देखभाल के उपाय बताते हुए कहा कि इस समय सूर्य की किरणों से त्वचा के बचाव के लिए सनस्क्रीन का लेप काफी प्रभावी माना जाता है। इसके अलावा टोपी पहनना, छाता लेकर चलना तथा दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक घर में रहना वैकल्पिक उपाय माने जाते हैं। अगर आपको भरी दोपहर में घर से निकलना ही पड़े तो सूर्य की गर्मी से बचाव करने वाली सनस्क्रीन बाजार में उपलब्ध है। सूर्य की गर्मी तथा वायु प्रदूषण से चेहरे पर कील -मुहांसे, छाइयां, काले दाग, ब्लैकशेड तथा पसीने की बदबू की समस्या हो जाती है। कैसे झुलसती है त्वचा -
त्वचा को सर्दियों में यूं रखें मुलायम
Subir Sen 2018-01-10 01:30:30
नई दिल्ली, 10 जनवरी (आरएनआई) | सर्दियों के मौसम में त्वचा में रूखापन आना आम बात है, इसलिए त्वचा में कोमलता बरकरार रखने के लिए पपीता, नींबू या शहद युक्त नैचुरल मॉइश्चराइजर या कोकोनट मास्क का इस्तेमाल करें। 'जीवा आयुर्वेदा' के निदेशक प्रताप चौहान और 'जस्ट हर्ब्स' की ब्रांड निदेशक मेघा सबलोक ने इस संबंध में ये सुझाव दिए हैं : * गुड़हल, शहद और नारियल तेल से एंटी-एजिंग मास्क बनाने के लिए गुड़हल के फूल को दो कप पानी में तब तक उबालें, जब तक पानी आधा कप न रह जाए। अब इसमें शहद और नारियल तेल मिला लें और चेहरे व गर्दन पर लगाएं। 10-15 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें। गुड़हल में अल्फा-हाइड्रोक्सी एसिड (एएचए) होता है, जो त्वचा को ताजगी प्रदान करता है और फ्लेक्सिबिलिटीमें सुधार करता है। इस मास्क के इस्तेमाल से त्वचा में चमक और कसाव भी आता है।

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